Thursday, July 24, 2008

फूल खिले शाख़ों पर नये और दर्द पुराने याद आए

आवाज़ का सोज़,शायरी में कहा-अनकहा गाने और मौसीक़ी के ज़रिये ख़ुद एक नाकाम प्रेमी बन जाने का हुनर मेहदी हसन साहब से बेहतर कौन जानता है. गायकी के ठाठ का जलवा और फ़िर भी उसमें एक लाजवाब मासूमियत (जो इस ग़ज़ल की ज़रूरत है)कैसे बह निकली है इस ग़ज़ल में.एक एक शब्द के मानी जैसे गले में गलाते जा रहे हैं उस्ताद.या कभी ऐसे सुनाई दे रहे जैसे अपनी माशूका के गाँव में आकर नदी किनारे पर एक दरख़्त के नीचे आ बैठे हैं जहाँ कभी रोज़ आना था,मुलाक़ातें थी,बातें थीं,अपनेपन थी,रूठने थे,मनाने थे.

अगर सुनने वाला ज़रा सा भी भावुक है तो अपने सुखी/दुखी माज़ी में अपने आप चला जाता है. कभी गले से, कभी बाजे से कहर ढाते मेहंदी हसन साहब जैसे ज़माने भर का दर्द अपनी आवाज़ में समेट लाए हैं. कैसी विकलता है अपनी कहानी कहने की.जैसे महावर लगे पैसे में कोई तीख़ा काँटा चुभ आया है.अब कहना भी है और रोना भी आ रहा है. बात पूरी जानी चाहिये. दीवानगी के प्रवक्ता बन गए हैं मेहंदी हसन साहब. रागदारी का पूरा शबाब, गोया वाजिद अली शाह के दरबार में गा रहे हों... ग़ज़ल को ठुमरी अंग से सँवारते. आवाज़ से चित्रकारी न देखी हो तो इस ग़ज़ल को सुनिये लगेगा मन, मौसम, विवशता, रिश्ते और रूहानी तबियत के कमेंटेटर बन बैठे हैं मेहदी हसन साहब.

शायरी को कैसे पिया और जिया जाता है , उस्ताद मेहदी हसन की इस ग़ज़ल में महसूस कीजिये. न जाने कितने दिलजलों को आवाज़ दे दी है उन्होनें इस ग़ज़ल से.ठंडी सर्द हवा के झोंके ..वाला मतला गाते वक़्त तो ऐसा लगता है जैसे जिस्म में हवा घुसे चले जा रही है और किसी की याद में आग के सामने बैठी विरहिणी ज़ार ज़ार आँसू बहाती अपने दुपटटे का कोना उंगलियों पर लपेट रही है...खोल रही है ..और इस सब में अपने प्रियतम के साथ गुज़रा ज़माना साकार हो रहा है.

अपनी बात इस नोट पर ख़त्म करना चाहता हूँ कि मेहदी हसन की ये ग़ज़लें न होती तो असंख्य दिल अपनी बात कहने की इबारतें कहाँ से लाते ?

जी चाहता मर जाइये इस ग़ज़ल पर...ज़माने में है कुछ मेहंदी हसन की आवाज़ के सिवा ... ग़ज़ल रज़ी तीरमाज़ी साहब की है जिनकी एक और रचना 'दिल वालो क्या देख रहे हो' को ग़ुलाम अली ने बड़ा मीठा गाया था.




भूली बिसरी चांद उम्मीदें, चंद फ़साने याद आये
तुम याद आये और तुम्हारे साथ ज़माने याद आये

दिल का चमन शादाब था फिर भी ख़ाक सी उडती रहती थी
कैसे ज़माने ग़म-ए-जानां तेरे बहाने याद आये

ठंडी सर्द हवा के झोंके आग लगा कर छोड़ गए
फूल खिले शाखों पे नए और दर्द पुराने याद आये

हंसने वालों से डरते थे, छुप छुप कर रो लेते थे
गहरी - गहरी सोच में डूबे दो दीवाने याद आये

3 comments:

Ashok Pande said...

पिछली पोस्ट पर भाई महेन का कमेन्ट था कि लगातार मेहदी हसन साहब को सुख़नसाज़ पर क्यों बजाया जा रहा है जबकि वे ग़ज़लें हज़ारों-हज़ार बार सुनी जा चुकी हैं. और गाने वालों को भी जगह मिलनी चाहिए. उस सिलसिले में मैं महेन जी को बताना चाहूंगा कि यहां एक तरह से मेहदी हसन साहब की गायकी का अघोषित फ़ेस्टीवल चल रहा है. बस थोड़ा और इन्तज़ार करें और लुत्फ़ उठाएं इस मखमल अहसास का.

संजय भाई, हमेशा की तरह आपका अन्दाज़-ए-बयां निखालिस अपनेपन से भरपूर और ताज़गी से भी.

धन्यवाद!

Udan Tashtari said...

बहुत जबरदस्त!! आभार सुनवाने का.

RA said...

संजय दा ,
क्या खूब ग़ज़ल सुनवाई है आपने |
सुनते सुनते तस्वीरें बना जाने वाली ग़ज़ल है यह |शायर के जज़्बात और गायक की आवाज़ का सुंदर मिश्रण है |
इसी भाव का एक अंग्रेजी गाना भी कल सुना था पर जानी पहचानी भाषा में एहसासात का बयां करती ग़ज़लों की बात, उनका प्रभाव ही कुछ और |आपकी बतायी रज़ी तीरमाज़ी साहब की दूसरी ग़ज़ल 'दिल वालों क्या देख रहे हो ' भी सुनी और सराही जाती है |