Tuesday, July 29, 2008

मौत भी आई तो इस नाज़ के साथ, मुझ पे अहसान किया हो जैसे

जनाब अहसान दानिश की यह ग़ज़ल मुझे इस एक ख़ास शेर के कारण बहुत ऊंचे दर्ज़े की लगती रही है:

इश्क़ को शिर्क की हद तक न बढ़ा
यूं न छुप हम से ख़ुदा हो जैसे


और जब गाने वाले उस्ताद मेहदी हसन हों तो और क्या चाहिये.




यूं न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे
साथ चल मौज-ए-सबा हो जैसे

लोग यूं देख के हंस देते हैं
तू मुझे भूल गया हो जैसे

इश्क़ को शिर्क की हद तक न बढ़ा
यूं न छुप हम से ख़ुदा हो जैसे

मौत भी आई तो इस नाज़ के साथ
मुझ पे अहसान किया हो जैसे

(मौज-ए-सबा: हवा का झोंका, शिर्क: ईश्वर को बुरा भला कहना - Blasphemy)

11 comments:

विनीता यशस्वी said...

... लोग यूं देख के हंस देते हैं
तू मुझे भूल गया हो जैसे

बहुत अच्छी गज़ल सुनाने का धन्यवाद.

बाल किशन said...

वाह वाह
बहुत खूब.
बहुत आनंद आया.
आपको धन्यवाद.

अनुराग said...

subhan allah.......ek aor baat aapka aor hamara chittha ke template bhi ek hai.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुंदर ...शुक्रिया इसको सुनवाने का

मीत said...

लोग यूं देख के हंस देते हैं
तू मुझे भूल गया हो जैसे

इश्क़ को शिर्क की हद तक न बढ़ा
यूं न छुप हम से ख़ुदा हो जैसे

मालिक, आज कल हद कर दी है आप ने. ये शेर हैं ??

Udan Tashtari said...

शुक्रिया इसको सुनवाने का

pallavi trivedi said...

bahut sundar...shukriya

कंचन सिंह चौहान said...

kya baat hai...har sher khubsurat

नीरज गोस्वामी said...

क्या बात है...दोनों उस्ताद एक साथ...एक शायरी का और एक गायकी का...वाह
नीरज

शायदा said...

अगर कभी शुक्रिया न भी कर सकें तो जारी रखिएगा सिलसिला। बेहतरीन । कल देर शाम तक बार-बार कोशिश करने पर भी सुना नहीं जा सका, बाद में ख़ूब सुना, देर रात तक और आज भी।

गरिमा said...

वाह.. इत्ती सुन्दर, शुक्रिया सुनवाने के लिये