Thursday, July 24, 2008

दिल ने भी तेरे सीख लिए हैं चलन तमाम



ग़ुलाम अली द्वारा विख्यात की गई ग़ज़ल 'चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है' लिखने वाले हसरत मोहानी साहब (१८८१-१९५१) की ग़ज़ल गा रहे हैं उस्ताद मेहदी हसन:




रोशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम
दहका हुआ है आतिश-ए-गुल से चमन तमाम

हैरत ग़ुरूर-ए-हुस्न से शोखी से इज़्तराब
दिल ने भी तेरे सीख लिए हैं चलन तमाम

अल्लाह रे जिस्म-ए-यार की ख़ूबी कि ख़ुद-ब-ख़ुद
रंगीनियों में डूब गया पैराहन तमाम

देखो तो हुस्न-ए-यार की जादू निगाहियां
बेहोश इक नज़र में अंजुमन तमाम

3 comments:

महेन said...

ग़ज़लें तो आप हमेशा अच्छी ही पोस्ट करते रहे हैं मगर शिकायत यह है कि ये सब तो ह्ज़ारों बार सुन चुके हैं। थोड़ा परिवर्तन भी चाहिये। जैसे कभी इक़बाल बानो, कभी मेहदी हसन, कभी फ़रीदा ख़ानम।
यहाँ आना बहुत अच्छा लगता है हमें।
शुभम।

दिलीप कवठेकर said...

शायद यह ब्लोग उनके लिये भी(BHEE) है, जो कभी कभार मेहंदी हसन जी को सुनते है, या जो कभी भी थकते नही उनके नशे से .

तो लगे रहो अशोक भाई,

बाकी रही बात दूसरों की तो सभी का स्वागत है.

महामंत्री-तस्लीम said...

बहुत खूबसूरत गजल है।