Thursday, September 18, 2008

तुझको मंज़िल पे पहुंचने का है दावा हमदम, मुझको अन्जाम नज़र आता है आग़ाज़ अभी

उस्ताद मेहदी हसन ख़ां साहब की एक बहुत आलीशान, बहुत अलहदा सी ग़ज़ल प्रस्तुत है:



तुझको आते ही नहीं छुपने के अन्दाज़ अभी
मेरे सीने में है लरज़ां तेरी आवाज़ अभी

उसने देखा भी नहीं दर्द का आग़ाज़ अभी
इश्क़ को अपनी तमन्ना पे है नाज़ अभी

तुझको मंज़िल पे पहुंचने का है दावा हमदम
मुझको अन्जाम नज़र आता है आग़ाज़ अभी

किस क़दर गो़श बर आवाज़ है ख़ामोशि-ए-शब
कोई ला ला के है फ़रियाद का दरबाज़ अभी

मेरे चेहरे की हंसी, रंग शिकस्ता मेरा
तेरे अश्कों में तबस्सुम का है अन्दाज़ अभी

11 comments:

मैथिली गुप्त said...

बेहद बेहद सुरीला
जितनी बार सुना जाये कम है

विनीता यशस्वी said...

सुन्दर!

नीरज गोस्वामी said...

आभार इतनी सुरीली ग़ज़ल सुनवाने के लिए...वाह..
नीरज

एस. बी. सिंह said...

umdaa gazal umdaa gayaki aur umdaa pasand

seema gupta said...

"enjoyed listing it, thanks for sharing"

Regards

सजीव सारथी said...

वाह नायाब

फ़िरदौस ख़ान said...

तुझको आते ही नहीं छुपने के अन्दाज़ अभी
मेरे सीने में है लरज़ां तेरी आवाज़ अभी

उसने देखा भी नहीं दर्द का आग़ाज़ अभी
इश्क़ को अपनी तमन्ना पे है नाज़ अभी

बहुत ही उम्दा ग़ज़ल है...

pallavi trivedi said...

behatreen ghazal....

ललितमोहन त्रिवेदी said...

अशोक जी ! मेहदीहसन के अपने परंपरागत अंदाज़ से हटकर गाई गई इस ग़ज़ल को सुनवाने के लिए आभार !

दिलीप कवठेकर said...

बेहतरीन गज़ल, और तबले का भी बेहतरीन अंदाज़ और लटके झटके..आज पच्चीस साल बाद फ़िर सुनी.

अब इस खा़मोशि-ए-शब का पूरा लुत्फ़ उठाते है.

Anuradha Trivedi Singh said...

क्या इस ग़ज़ल के शायर का नाम कोई बता सकते हैं?