Sunday, September 14, 2008

बेगम अख़्तर सुना रहीं हैं ये गुजराती ग़ज़ल


सुख़नसाज़ पर पहले एक बार मोहम्मद रफ़ी साहब की गुजराती ग़ज़ल लगाई थी.आज हाथ आ गई अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी यानी बेगम अख़्तर की ये गुजराती ग़ज़ल. मतला मुलाहिज़ा फ़रमाएँ.

में तजी तारी तमन्ना तेनो आ अंजाम छे
के हवे साचेज लागे छे के तारू काम छे



अब मज़ा ये देखिये की पूरी ग़ज़ल सुनते कहीं लगता नहीं कि भाषा कहीं आड़े आ रही है. हमारे मीत भाई जब तब कहते हैं कि मुझे राग-रागिनी समझ नहीं आ रही फ़िर भी बस सुन रहा हूँ तो बात बिलकुछ ठीक जान पड़ती है. सुर के बावरे कहाँ भाषा और रागदारी के प्रपंच में पड़ते हैं. बस एक अहसास है मौसिक़ी का उसे पिये जाइये. ये सुनना भी एक तरह की मस्ती है जैसे बेगम मक्ते में कहती है कि मेरी इस इस मजबूर मस्ती का नशा उतर गया है और भी कह रहे हैं की मुझे आराम आ गया है.
ग़ौर फ़रमाएँ खुदा और जिन्दगी कह गईं हैं बेगम.तो क्या तलफ़्फ़ुज़ नहीं जानतीं वे ?
नहीं हुज़ूर वे लोकल डायलेक्ट (बोली)को निभाने का हुनर रखतीं है सो यहाँ जैसा गुजराती में बोला जाएगा वैसा ही गाया है बेगम अख़्तर ने.

बेगम अख़्तर यानी सुरीली दुनिया की परी.जिनकी आवाज़ में आकर सारी शायरी,दादरे,ठुमरियाँ एक अजीब क़िस्म की पैरहन ओढ़ लेती है. कैसे कमाल के काम कर गईं हैं ये महान रूहें.सुनो रे बेसुरेपन को बेचने वालों...सुनो क्या गा गईं हैं अख़्तरी बाई.



इस प्लेयर पर भी बज रही है ये ग़ज़ल:
Boomp3.com

3 comments:

surabesura said...

गुजराती गज़ल,वह भी बेग़म अख़्तर की आवाज़ में!गजब !भाई मेरे , नं. १ जुगाड़ी हैं ।
- अफ़लातून.

संजय पटेल said...

अफ़लातून भाई-प्रणाम
महज़ जुगाड़ नहीं ये किशोरवय में बेगम को अहमदाबाद में सामने गाते सुना भी था. कम्पोज़िशन है पं.पुरूषोत्तम उपाध्याय का जो गुजराती सुगम संगीत के जाने माने गायक और संगीतकार हैं.बेगम के एक ज़बरदस्त मुरीद के बारे में एक पोस्ट शीघ्र ही पढ़वाऊंगा आपको.

yunus said...

संजय भाई
संगीत भाषाओं का मोहताज नहीं होता ।

अख्‍तरी बाई किसी हिब्रू भाषा में भी गातीं तो भी
उतनी ही सुरीली लगतीं ।
आवाजें दीवारों से छन जाती हैं ।
ऐसी सुरीली आवाज हम तक पहुंचाने का शुक्रिया