Saturday, September 13, 2008

बेसबब हुआ 'ग़ालिब' दुश्मन आसमाँ अपना








आज पेश है एक ग़ज़ल ग़ालिब की..... आवाज़ "ग़ज़लों की मलिका' बेगम अख्तर की :


ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयाँ अपना


ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयाँ अपना
बन गया रकीब आख़िर था जो राजदां अपना

मय वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ए-गै़र में यारब !
आज ही हुआ मंज़ूर, उन को इम्तेहाँ अपना

मंज़र एक बुलंदी पर और हम बना सकते
अर्श से उधर होता, काश कि मकाँ अपना

हम कहाँ के दाना थे, किस हुनर में यकता थे
बेसबब हुआ 'ग़ालिब' दुश्मन आसमाँ अपना



6 comments:

vijay gaur/विजय गौड़ said...

ashok bhai hindi script padne mai nhi aa raha hai, lekin yah problm sirf I.E mai aa rahi hai jabki mozila pr theek hai, fir bhi yadi sambhaw ho to I P ke liye bhi durast kar den.

vijay gaur/विजय गौड़ said...

ashok bhai hindi script padne mai nhi aa raha hai, lekin yah problm sirf I.E mai aa rahi hai jabki mozila pr theek hai, fir bhi yadi sambhaw ho to I P ke liye bhi durast kar den.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुद खूब मीत जी, धन्यवाद!

Vijay Gaur Ji,
Please check the following setting should work on IE:

View-> Encoding -> Unicode (UTF-8)

sidheshwer said...

सुबह-सुबह आनंद!

फ़िरदौस ख़ान said...

मय वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ए-गै़र में यारब !
आज ही हुआ मंज़ूर, उन को इम्तेहाँ अपना

मंज़र एक बुलंदी पर और हम बना सकते
अर्श से उधर होता, काश कि मकाँ अपना

शानदार पेशकश है...

महेन said...

बहुत ही मज्जेदार मीत भाई।