Saturday, August 16, 2008

बिछुआ बाजे रे ... ओ बलम - इक़बाल बानो

दोस्तो संगीत का कोई ज्ञान नहीं है मुझे .... दो कौड़ी का नहीं. बस लत है सुनने की ...

और जब इक़बाल बानो की आवाज़ में ऐसा कुछ हो ... तो लगता है कि कुछ और लोग भी सुनें.

तो आज सुनिए ये ग़ज़ब .... "बिछुआ बाजे रे ... ओ बलम...............".



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6 comments:

Ashok Pande said...

बहुत पहले आए एक कैसेट में सुनी थी यह कम्पोज़ीशन भाई! उसी में यह वाली भी थी ना - "मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए ..."?

पुराने दिन, पुरानी यादें सब याद कराने का अहसान साब. बहुत बढ़िया.

संजय पटेल said...

इकबाल आपा जैसी गुलूकारा को सुनता हूँ मीत भैया/अशोक भैया तो लगता कि ये लोग किसी ख़ास मकसद के लिये इस धरती पर आये थे.अब जितना संगीत मैं समझता हूँ उसके बूते पर कह सकता हूँ कि इकबाल बानो की आवाज़ का पिच एक हद तक जाता है यानी एक लिमिटेड रेंज है लेकिन जिस तरह वे गाने को वे इंजाय करती हैं वैसी कोई दूसरी गुलूकारा नहीं कर पाती.ये वैसा ही मामला है जैसा हमारे मालवा के गान-अवधूत कुमार गंधर्व का. वे भी जानते थे अपने गले की हदें लेकिन उस मर्यादा में भी वो जो करिश्मे करते थे वैसा अच्छे अच्छे दम वाले भी न कर पाए.इस गीत में देखिये इकबाल आपा आपको झूमने पर मजबूर कर रही हैं...गोया उनका गला रक़्स भी कर रहा है ....

दिलीप कवठेकर said...

Not able to listen completely

दिलीप कवठेकर said...

Got it, Excellent!!

Lavanyam - Antarman said...

सँजय भाई की बातेँ हरेक कलाकार की खासियत को नवाजती है और गीत भी अलहड सा बहुत भाया !
- लावण्या

कंचन सिंह चौहान said...

aisi late to bani hi rahe.n