Saturday, August 2, 2008

मुमकिन हो आप से तो भुला दीजिए मुझे

शहज़ाद अहमद 'शहज़ाद' की ग़ज़ल पेश-ए-ख़िदमत है आज. अभी उस्ताद की महफ़िल कुछ दिन और जारी रखने का इरादा है.



मुमकिन हो आप से, तो भुला दीजिए मुझे
पत्थर पे हूं लकीर, मिटा दीजिए मुझे

हर रोज़ मुझी से ताज़ा शिकायत है आपको
मैं क्या हूं एक बार बता दीजिए मुझे

क़ायम तो हो सके रिश्ता गुहर के साथ
गहरे समन्दरों में बहा दीजिए मुझे

शहज़ाह यूं तो शोला-ए-जां सर्द हो चुका
लेकिन सुलग उठूं तो हवा दीजिए मुझे

8 comments:

Manish Kumar said...

shahzaad sahab ki likhi is pyari ghazal ko share karne ke liye shukriya.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

हर रोज़ मुझी से ताज़ा शिकायत है आपको
मैं क्या हूं एक बार बता दीजिए मुझे

सुंदर गजल .सुनवाने का शुक्रिया

दिलीप कवठेकर said...

मालिक से दुआ है की खांं साहब को लंबी उमर अता करे, और आप को भी, जो हर दिन एक ताज़ा गज़ल की अविरत परोसगारी कर रहें है.

क्रुपया, थाम थाम कर परोसिये, इतनी मिथाई की diabetes हो जाये.मगर चलेगा.

ंमेहदी साहब की आवाज़ में लर्जिश के साथ साथ जो अदायगी है वह अलहेदा है, मगर मीठास भी लाजवाब. पंडित पलुसकर जी की आवाज़ के बाद हमारे खां साहब, और कोइ नही.

रविवार की अलसुबह कमेंट पोस्ट कर्ने वाले को भी सलाम. यही सुखन्साज़ की कमाई है.

सजीव सारथी said...

एक बार फ़िर जबरदस्त गायिका का नमूना, क्या पकड़ है अल्फाजों पर, शुक्रिया साब मज़ा आ गया ...

सजीव सारथी said...

एक बार फ़िर जबरदस्त गायिका का नमूना, क्या पकड़ है अल्फाजों पर, शुक्रिया साब मज़ा आ गया ...

महेन said...

क्या बात है गुरुदेव, हसन साहब छाए हुए हैं आजकल सुख़नसाज़ पर। हम भी पूरा लुत्फ़ ले रहे हैं। खूब है।

swapandarshi said...

Ashok,
Mene pahale ye Gazal, Suzaat khaan kee aawaaz me suni hai, behatareen sitaar ke saath. Mehndi hasan kee apanee style hai, unkee mureed huye bhee nahee rahaa jaata. par fir bhee, mere khyaal se Sujaat Khaan ne bahut hee kamaal se gaaya hai, "Sur aur Saaz" naam kee CD/cassette me milega.

indianrj said...

मेहदी हसन साहेब की तो खैर बात ही कुछ और है लेकिन कुछ दिन पहले ये ग़ज़ल हाफिज अली की आवाज़ में सुनी, तब से उनकी मुरीद हो गई.