Sunday, August 10, 2008

रफ़ी साहब की मख़मली आवाज़ में एक अविस्मरणीय गुजराती ग़ज़ल

ईरान से आई ग़ज़ल जिस तरह हिंदुस्तान की मिट्टी में रच बस गई वह अदभुत है.न जाने कितने मतले रोज़ रचे जाते हैं गाँव-गाँव , शहर-शहर में.ग़ज़ल की ताक़त और आकर्षण देखिये कि वह उर्दू महदूद नहीं , वह दीगर कई भाषाओं में यात्रा कर रही है जिनमें मराठी,गुजराती,सिंधी,बांग्ला,राजस्थानी तो शामिल हैं ही मराठी और निमाड़ी जैसे लोक – बोलियाँ भी जुड़ गईं है.ख़ूब फल-फूल रही है ग़ज़ल.बहर के अनुशासन में रह कर अपनी बात को कहने की जो आज़ादी शायर को मिलती है वही इसे लोकप्रिय बनाती है.
आज पहली बार उर्दू से हटकर आपके लिये सुख़नसाज़ पर पेश-ए-ख़िदमत है एक गुजराती ग़ज़ल.गायक हैं हमारे आपके महबूब गुलूकार मोहम्मद रफ़ी साहब. इस महान गायक की गायकी का कमाल देखिये किस तरह से एक दूसरी भाषा को अपने गले से निभाया है. तलफ़्फ़ुज़ की सफ़ाई में तो रफ़ी साहब बेजोड़ हैं ही, भाव-पक्ष को भी ऐसे व्यक्त कर गए हैं कि कोई गुजराती भाषी गायक भी क्या करेगा.मज़ा देखिये की एक क्षेत्रिय भाषा में गाते हुए रफ़ी साहब ने ज़रूर को जरूर ही गाया है ग़नी को गनी और जहाँ ळ गाना है वहाँ ल नहीं गाया है..एक ख़ास बात और...मक़्ते में एक जगह जहाँ श्वास की बात आई ..वहाँ ध्यान से सुनियेगा कि एक नन्हा सा अंतराल (पॉज़) देकर रफ़ी साहब ने क्या कमाल किया है.
जब आप रफ़ी साहब को सुन रहे होते हैं तो लगता है क़ायनात की सबसे पाक़ आवाज़ आपको नसीब हो गई है.मुझे यक़ीन है ग़ज़ल और मौसीक़ी के मुरीदों के लिये भाषा किसी तरह की अड़चन नहीं होगी.कम्पोज़िशन,गायकी और भाव की दृष्टि से आप सुख़नसाज़ का यह रविवारीय नज़राना तहे-दिल से क़ुबूल करेंगे.




दिवसो जुदाई ना जाये छे,ए जाशे जरूर मिलन सुधी
मारो हाथ झाली ने लई जशे,मुझ शत्रुओज स्वजन सुधी

दिन जुदाई के बीत रहे हैं लेकिन ये मुझे मिलन तक ले जाएंगे.
मेरे दुश्मन ही मेरा हाथ थाम कर मुझे अपने स्वजनों के पास ले जाएंगे


न धरा सुधी न गगन सुधी,नही उन्नति ना पतन सुधी
फ़कत आपणे तो जवु हतुं, अरे एकमेक ना मन सुधी

न धरती तक, न आसमान तक , न पतन तक न उन्नति तक
हमें तो सिर्फ़ जाना था एक दूसरे के मन तक


तमे रात ना छो रतन समाँ,ना मळो है आँसुओ धूळ माँ
जो अरज कबूल हो आटली,तो ह्र्दय थी जाओ नयन सुधी

आप तो ग़रीब के लिये दमकते हीरे से हो,धूल और आँसू में नहीं जा मिलते
अगर प्रार्थना स्वीकार हो इतनी तो ह्र्दय से नयन तक तो चले जाइये.


तमे राज-राणी ना चीर सम,अमें रंक नार नी चूंदड़ी
तमे तन पे रहो घड़ी बे घड़ी,अमें साथ दयै कफ़न सुधी

आप तो राजरानी के वस्त्र जैसे हैं और हम ग़रीब की चूनर जैसे
आप तन पर घड़ी दो घड़ी के लिये रहते हैं,हम तो कफ़न हो जाने तक के साथी हैं


जो ह्र्दय नी आग वधी गनी तो ख़ुद ईश्वरेज कृपा करी
कोई श्वास बंद करी गयुँ,के पवन ना जाए अगन सुधी

अगर ह्र्दय की आग ग़नी(शायर ग़नी दहीवाला का तख़ल्लुस) बढ़ गई,तो ख़ुद ईश्वर ने ही कृपा की है ऐसा मानो ;कोई श्वास को बंद कर गया है ,हवा अग्नि तक नहीं जा रही है.

10 comments:

सजीव सारथी said...

कितना दर्द है इस गीत में, डूब गया हूँ वाकई .....तीसरी बार सुन रहा हूँ....

विनीता यशस्वी said...

अद्भुत, आल्हादकारी संगीत. धन्यवाद सुनवाने का.

Ashok Pande said...

कमाल है संजय भाई!

ग़ज़ल का यह निराला गुजराती अन्दाज़ यहां प्रस्तुत कर आपने सुख़नसाज़ को और समृद्ध कर दिया. और रफ़ी साहब की आवाज़ पर कोई क्या कह सकता है - मेरे बस की बात तो नहीं है.

बेहतरीन पेशकश. दिन बना दिया आपने वाक़ई.

महेन said...

बस यही भाई अशोक। कमाल है। हमारी क्षेत्रीय भाषाओं में ही कितना अनमोल खज़ाना भरा पड़ा है, जिससे हम कभी रूबरू नहीं हो पाते। अपनी मराठी की एक ऐसी ही पोस्ट में मैनें इस बात पर ज़ोर दिया था। बहरहाल… रफ़ी साहब के बारे में क्या कहा जाए। उनकी हर भाषा को जज़्ब करने की महारत तो खैर प्रसिद्ध है ही।

महेन said...

अरे!! ग़लती हो गई… अशोक भाई से पहले संजय भाई।

Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर, आभार इस प्रस्तुति का.

मीत said...

क्या बात है ! ये हैं न रफ़ी साहब का जादू. ग़ज़ब.

RA said...

संजय दा,
आपने सरस ग़ज़ल सुनवायी है।
इसे पहली बार कुछ महीने पहले ही,यहाँ न्यूजर्सी में एक गुणी गीत मित्र के सौजन्य से सुनने का मौका मिला था।
आपका आलेख विशेष चार चाँद लगाता है । बारीकियों को समझ कर सुनने का मज़ा कुछ और ही है। रफ़ी साहब की गायकी सचमुच बेजोड़!

आपकी यह बेहतरीन रविवारीय पोस्ट अपने रेडियो के श्रोतागणों को सुनने/पढ़नें के लिये भेज रही हूँ।
सधन्यवाद,
खु़शबू

sidheshwer said...

बहुत बढिया साहब,
आपके लिए दिल से दुआ निकल रही है.
आभार!!!!!!!!!!!!!!!!!

Lavanyam - Antarman said...

मेरी पसँदीदा गुजराती गज़ल को हिन्दी मेँ समझाकर यहाँ प्रस्तुत कर आपने रफी साहब को हमारे सामने उपस्थित कर दिया है आज -
शुक्रिया सँजय भाई --
अब मुकेश जी का
"पँखीडाने आ पीँजरु जुनु जुनु लागे " भी सुनवा दीजियेगा -
- लावण्या