Sunday, July 20, 2008

रंग बिरंगे तन वालों का, सच ये है मन खाली है

'कहना उसे' से उस्ताद मेहदी हसन ख़ान साहब की आवाज़ में फ़रहत शहज़ाद की एक और ग़ज़ल:



सब के दिल में रहता हूं पर दिल का आंगन ख़ाली है
खु़शियां बांट रहा हूं जग में, अपना दामन ख़ाली है

गुल रुत आई, कलियां चटखीं, पत्ती-पत्ती मुसकाई
पर इक भौंरा न होने से गुलशन -गुलशन ख़ाली है

रंगों का फ़ुक दाम नहीं हर चन्द यहां पर जाने क्यूं
रंग बिरंगे तन वालों का, सच ये है मन खाली है

दर-दर की ठुकराई हुई ए मेहबूबा-ए-तनहाई
आ मिल जुल कर रह लें इस में, दिल का नशेमन ख़ाली है

(*आज लाइफ़लॉगर दिक्कत कर रहा है. उस के चालू होते ही प्लेयर बदल दिया जाएगा)

Friday, July 18, 2008

तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे

अब आप ही बताइए, इस ग़ज़ल के लिए क्या प्रस्तावना बांधी जाए?

अपने-अपने तरीके से नॉस्टैल्जिया महसूस करते हुए सुनें उस्ताद की यह कमाल रचना. क़लाम 'हफ़ीज़' जालन्धरी साहब का है:




मोहब्बत करने वाले कम न होंगे
तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे

ज़माने भर के ग़म या इक तेरा ग़म
ये ग़म होगा तो कितने ग़म न होंगे

अगर तू इत्तिफ़ाक़न मिल भी जाए
तेरी फ़ुरकत के सदमे कम न होंगे

दिलों की उलझनें बढ़ती रहेंगी
अगर कुछ मशविरे बाहम न होंगे

हफ़ीज़ उनसे मैं जितना बदगुमां हूं
वो मुझ से इस क़दर बरहम न होंगे

(फ़ुरकत: विरह, बाहम: आपस में)

Thursday, July 17, 2008

मैं उसे जितना समेटूं, वो बिखरता जाए

एह एम वी ने क़रीब बीस साल पहले मेहदी हसन साहब की लाइव कन्सर्ट का एक डबल कैसेट अल्बम जारी किया था: 'दरबार-ए-ग़ज़ल'. उस में पहली ही ग़ज़ल थी आलम ताब तश्ना की 'वो कि हर अहद-ए-मोहब्बत से मुकरता जाए'. बहुत अलग अन्दाज़ था उस पूरी अल्बम की ग़ज़लों का, गो यह बात अलग है कि उसकी ज़्यादातर रचनाओं को वह शोहरत हासिल नहीं हुई. हसन साहब की आवाज़ में शास्त्रीय संगीत के पेंच सुलझते चले जाते और अपने साथ बहुत-बहुत दूर तलक बहा ले जाया करते थे.

कुछेक सालों बाद बांग्लादेश के मेरे बेहद अज़ीज़ संगीतकार मित्र ज़ुबैर ने वह अल्बम ज़बरदस्ती मुझसे हथिया लिया था. उसका कोई अफ़सोस नहीं मुझे क्योंकि ज़ुबैर ने कई-कई मर्तबा उन्हीं ग़ज़लों को अपनी मख़मल आवाज़ में मुझे सुनाया. ज़ुबैर के चले जाने के कुछ सालों बाद तक मुझे इस अल्बम की याद आती रही ख़ास तौर पर उस ग़ज़ल की जिसका ज़िक्र मैंने ऊपर किया. यह संग्रह बहुत खोजने पर कहीं मिल भी न सका. कुछ माह पहले एक मित्र की गाड़ी में यूं ही बज रही वाहियात चीज़ों के बीच अचानक यही ग़ज़ल बजने लगी. बीस रुपए में मेरे दोस्त ने दिल्ली-नैनीताल राजमार्ग स्थित किसी ढाबे से सटे खोखे से गाड़ी में समय काटने के उद्देश्य से 'रंगीन गजल' शीर्षक यह पायरेटेड सीडी खरीदी थी. नीम मलबूस हसीनाओं की नुमाइशें लगाता उस सीडी का आवरण यहां प्रस्तुत करने लायक नहीं अलबत्ता आलम ताब तश्ना साहब की ग़ज़ल इस जगह पेश किए जाने की सलाहियत ज़रूर रखती है. ग़ज़ल का यह संस्करण 'दरबार-ए-ग़ज़ल' वाले से थोड़ा सा मुख़्तलिफ़ है लेकिन है लाइव कन्सर्ट का हिस्सा ही.

सुनें:




वो कि हर अहद-ए-मोहब्बत से मुकरता जाए
दिल वो ज़ालिम कि उसी शख़्स पे मरता जाए

मेरे पहलू में वो आया भी तो ख़ुशबू की तरह
मैं उसे जितना समेटूं, वो बिखरता जाए

खुलते जाएं जो तेरे बन्द-ए-कबा ज़ुल्फ़ के साथ
रंग पैराहन-ए-शब और निखरता जाए

इश्क़ की नर्म निगाही से हिना हों रुख़सार
हुस्न वो हुस्न जो देखे से निखरता जाए

क्यों न हम उसको दिल-ओ-जान से चाहें 'तश्ना'
वो जो एक दुश्मन-ए-जां प्यार भी करता जाए

(अहद-ए-मोहब्बत: प्यार में किये गए वायदे, पैराहन-ए-शब: रात्रि के वस्त्र, हिना हों रुख़सार: गालों पर लाली छा जाए)

Wednesday, July 16, 2008

वो न समझा है न समझेगा मगर कहना उसे

मेहदी हसन साहब के अलबम 'कहना उसे' से एक ग़ज़ल आप पहले भी सुन चुके हैं. आज सुनिये इसी संग्रह की शीर्षक ग़ज़ल:



कोपलें फिर फूट आईं शाख़ पर कहना उसे
वो न समझा है न समझेगा मगर कहना उसे

वक़्त का तूफ़ान हर इक शै बहा के ले गया
कितनी तन्हा हो गई है रहगुज़र कहना उसे

जा रहा है छोड़ कर तनहा मुझे जिसके लिए
चैन ना दे पाएगा वो सीम-ओ-ज़र कहना उसे

रिस रहा हो ख़ून दिल से लब मगर हंसते रहें
कर गया बरबाद मुझ को ये हुनर कहना उसे

जिसने ज़ख़्मों से मेरा'शहज़ाद' सीना भर दिया
मुस्करा कर आज प्यारे चारागर कहना उसे

(सीम-ओ-ज़र: धन-दौलत, चारागर: चिकित्सक)

Tuesday, July 15, 2008

काँटों का भी हक़ है कुछ आख़िर, कौन छुड़ाए अपना दामन



जनाब अली सिकन्दर उर्फ़ जिगर मुरादाबादी साहब की अविस्मरणीय ग़ज़ल को गा रही हैं बेग़म अख़्तर:



कोई ये कह दे गुलशन गुलशन
लाख बलाएँ एक नशेमन

फूल खिले हैं गुलशन गुलशन
लेकिन अपना अपना दामन

आज न जाने राज़ ये क्या है
हिज्र की रात और इतनी रोशन

रहमत होगी तालिब-ए-इसियाँ
रश्क करेगी पाकी-ए-दामन

काँटों का भी हक़ है कुछ आख़िर
कौन छुड़ाए अपना दामन

Monday, July 14, 2008

लो दिल की बात आप भी हम से छुपा गए

रेशमा आपा का 'दर्द' अभी जारी है. सुनिये उसी संग्रह से एक और ग़ज़ल. संभवतः ग़ज़ल सुरेन्दर मलिक 'गुमनाम' की है, जिनकी बहुत सारी ग़ज़लें ग़ुलाम अली ने अपने 'हसीन लम्हे' सीरीज़ में गाई थीं. यह सीरीज़ और रेशमा का संग्रह 'दर्द' दोनों क़रीब - क़रीब एक साथ वेस्टन ने निकाले थे.



लो दिल की बात आप भी हम से छुपा गए
लगता है आप ग़ैरों की बातों में आ गए

मेरी तो इल्तिजा थी, रक़ीबों से मत मिलो
उनके बिछाए जाल में लो तुम भी आ गए

ये इश्क़ का सफ़र है, मंज़िल है इस की मौत
घायल जो करने आए थे, वही चोट खा गए

रोना था मुझ को उन के दामन में ज़ार-ज़ार
पलकों के मेरे अश्क़ उन्हीं को रुला गए

'गुमनाम' भूलता नहीं वो तेरी रहगुज़र
जिस रहगुज़र पे प्यार की शम्मः बुझा गए

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देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियां

Sunday, July 13, 2008

ये तो कहो कभी इश्क़ किया है, जग में हुए हो रुसवा भी

रेशमा आपा का संग्रह 'दर्द' मेरे दिल के बहुत नज़दीक है. इस अलबम से मेरा परिचय पहली बार उनके असली रूप से हुआ. एक तो हमारे छोटे से कस्बे में उस मिजाज़ के कैसेट मिलते ही नहीं थे. हद से हद कभी कभी गु़लाम अली या मेहदी हसन साहब हाथ लग जाते थे. ज़्यादातर अच्छा संगीत हमें दोस्तों के दिल्ली-लखनऊ जैसे बड़े शहरों से आये मित्र-परिचितों के माध्यम से मिला करता था.हल्द्वानी जैसे निहायत कलाहीन नगर में रेशमा का यह कैसेट मिलना जैसे किसी चमत्कार की तरह घटा. कई सालों तक उसे लगातार-लगातार सुना गया और पांचेक साल पहले किन्हीं पारकर साहब की कृपा का भागी बन गया.

आज सुबह से इंशा जी की किताब पढ़ रहा था. उसमें 'देख हमारे माथे पर' ग़ज़ल वाले पन्ने पर पहुंचते ही दिल को रेशमा आपा की आवाज़ में इस ग़ज़ल की बेतरह याद उठना शुरू हुई.

कुछ दिन पहले अपने मित्र सिद्धेश्वर बाबू ने इस अलबम का ज़िक्र किया था. उम्मीद के साथ उन्हें फ़ोन लगाया पर उनके वाले कैसेट को भी पारकर साहब की नज़र लग चुकी थी.ज़रा देर बाद सिद्धेश्वर का फ़ोन आया कि मेल चैक करूं. अपने बाऊजी ने जाने कहां कहां की मशक्कत के बाद यह ग़ज़ल बाकायदा एम पी ३ फ़ॉर्मेट में बना कर मुझे मेल कर दी थी.

इस प्रिय गुरुवत मित्र को धन्यवाद कहते हुए आपकी सेवा में पेश है इब्न-ए-इंशा साहब की ग़ज़ल. इब्ने-ए-इंशा जी की एक नज़्म ग़ुलाम अली की और एक ग़ज़ल उस्ताद अमानत अली ख़ान की आवाज़ में आप पहले सुन ही चुके हैं:




देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियां
हम से है तेरा दर्द का नाता, देख हमें मत भूल मियां

अहल-ए-वफ़ा से बात न करना होगा तेरा उसूल मियां
हम क्यों छोड़ें इन गलियों के फेरों का मामूल मियां

ये तो कहो कभी इश्क़ किया है, जग में हुए हो रुसवा भी
इस के सिवा हम कुछ भी न पूछें, बाक़ी बात फ़िज़ूल मियां

अब तो हमें मंज़ूर है ये भी, शहर से निकलें रुसवा हों
तुझ को देखा, बातें कर लीं, मेहनत हुई वसूल मियां


(इस ग़ज़ल का मक़्ता बहुत सुन्दर है, जो यहां नहीं गाया गया:

इंशा जी क्या उज्र है तुमको, नक़्द-ए-दिल-ओ-जां नज़्र करो
रूपनगर के नाके पर ये लगता है महसूल मियां

दश्त-ए-तलब: इच्छा का जंगल, मामूल: दिनचर्या, नाका: चुंगी, महसूल: चुंगी पर वसूला जाने वाला टैक्स.

एक निवेदन: यदि आप में से किसी को मालूम हो कि मेराज-ए-ग़ज़ल में ग़ुलाम अली और आशा भोंसले की गाई 'फिर सावन रुत की पवन चली, तुम याद आए' किसने लिखी है, तो बताने का कष्ट ज़रूर करें. बन्दा अहसानमन्द रहेगा.)

Saturday, July 12, 2008

दिल दीवाना तेरा भी है मेरा भी

जगजीत सिंह और लता मंगेशकर ने सन १९९१ में 'सजदा' अलबम जारी किया था. संभवतः ग़ुलाम अली-आशा भोंसले के अलबम 'मेराज-ए-ग़ज़ल' और मेहदी हसन - शोभा गुर्टू के 'तर्ज़' जैसे संग्रहों के बाद आने वाला इस तरह की जुगलबन्दी वाला यह सबसे बेहतरीन कलेक्शन था.

आज प्रस्तुत की जा रही ग़ज़ल है १९३२ में नागपुर में जन्मे शायर शाहिद कबीर साहब की. 'चारों ओर' (१९६८), 'मिट्टी का मकान' (१९७९) और 'पहचान' (२०००) उनके प्रकाशित संग्रहों के नाम हैं.

बहुत सादा धुन में बहुत इत्मीनान से गाई गई है ये कम्पोज़ीशन. आनन्द उठाइये:




ग़म का ख़ज़ाना तेरा भी है, मेरा भी
ये नज़राना तेरा भी है, मेरा भी

अपने ग़म को गीत बना कर गा लेना
राग पुराना तेरा भी है मेरा भी

मैं तुझको और तू मुझको समझाएं क्या
दिल दीवाना तेरा भी है मेरा भी

शहर में गलियों गलियों जिसका चरचा है
वो अफ़साना तेरा भी है मेरा भी

मैख़ाने की बात न कर वाइज़ मुझ से
आना जाना तेरा भी है मेरा भी

Friday, July 11, 2008

फ़कीरानः आए सदा कर चले, मियां ख़ुश रहो हम दुआ कर चले

कई दिनों बाद आज इस ग़ज़ल को सुनते हुए मुझे बारहा ऐसा अहसास होता रहा कि यह किसी बीती सहस्त्राब्दी की फ़िल्म का हिस्सा है. मैं लगातार अपने आप से पूछता रहा कि क्या फ़क़त छब्बीस साल पहले इस दर्ज़े की कालजयी कृतियों को किसी फ़िल्म में बढ़िया पॉपुलर धुनों में बांधने वाले संगीतकार इसी धरती पर हुआ करते थे? उनमें से कोई बचे भी हैं या नहीं? या सब कुछ मार्केट के नाम पर औने-पौने बेच-लूट दिया गया?

१९८२ में सागर सरहदी की बहुचर्चित फ़िल्म 'बाज़ार' से पेश है बाबा मीर तक़ी मीर की विख्यात ग़ज़ल. इस फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह, स्मिता पाटिल, फ़ारुख़ शेख़ और सुप्रिया पाठक की मुख्य भूमिकाएं थीं. खैयाम साहब का संगीत है और लता मंगेशकर की आवाज़.




दिखाई दिये यूं कि बेख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले

जबीं सजदा करते ही करते गई
हक़-ए-बन्दगी हम अदा कर चले

परस्तिश की यां तक कि अय बुत तुझे
नज़र में सभों की ख़ुदा कर चले

बहुत आरज़ू थी गली की तेरी
सो यां से लहू में नहा कर चले

Thursday, July 10, 2008

इस वक़्त कोई मेरी क़सम देखता मुझे

बहुत ही कम आयु में दिवंगत हो गए अद्वितीय गायक मास्टर मदन की एक ग़ज़ल आपने चन्द दिन पहले सुनी थी. जैसा मैंने वायदा किया था, सुनिये मास्टर मदन की आवाज़ में साग़र निज़ामी की एक और ग़ज़ल



हैरत से तक रहा है जहान-ए-वफ़ा मुझे
तुम ने बना दिया है मोहब्बत में क्या मुझे

हर मंज़िल-ए-हयात से गुम कर गया मुझे
मुड़ मुड़ के राह में वो तेरा देखना मुझे

कैसे ख़ुशी ने मौज को कश्ती बना दिया
होश-ए-ख़ुदा अब न ग़म-ए-नाख़ुदा मुझे

साक़ी बने हुए हैं वो साग़र शब-ए-विसाल
इस वक़्त कोई मेरी क़सम देखता मुझे