वली मोहम्मद सुख़नसाज़ के मुरीदों के लिये अनजाना नाम नहीं है.
उन्हें सुनें तो लगता है जैसे सहरा में एक बाबा बाजा लेकर बैठ गए हैं और
कन्दील की मध्दिम रोशनी में आपको मनचाही बंदिशें सुना रहे हैं.
सनद रहे वली मोहम्मद जैसे गुलूकार तब परिदृश्य पर आए थे जब ज़माने
की गति ऐसी तूफ़ानी और बेपरवाह नहीं थी. सुक़ून और तसल्ली के दौर
के गायक रहे हैं वली मोहम्मद. उम्दा क़लाम को चुनना, गुनना और फ़िर गाना
उस दौर की ख़ासियत थी. मेरा प्यारा वतन मालवा इन दिनों ख़ासा उमस
भरा है;ऐसे में ऐसी रचना सुनना एक अलग रूहानी अहसास देता है.
मुलाहिज़ा फ़रमाएँ बाबा वली मोहम्मद की ये बेशक़ीमती रचना.
'राह देखा करेगा सदियों तक छोड़ जाएँगे ये जहाँ तन्हा’ : मीना कुमारी की याद
में
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मीना आपा के भीतर कोई चंचल-शोख़ और मन की उड़ान भरती कोई बेफिक्र लड़की रही
होगी...शायद कभी...क्या पता।
पर उनके जीवन पर उदासी का ग्रहण इतना गहरा था कि व...
3 years ago