इस आवाज़ का असर मुझ पर तो कुछ अजब सा होता है ..... आप पर ?
"शब की तन्हाई में इक बार सुन के देखा था
उस की आवाज़ का असर वो था, कि अब तक है..."
Monday, September 1, 2008
एक आवारा सी आवाज़
Posted by अमिताभ मीत at 5:19 PM 9 comments
Labels: रेशमा
Monday, July 14, 2008
लो दिल की बात आप भी हम से छुपा गए
रेशमा आपा का 'दर्द' अभी जारी है. सुनिये उसी संग्रह से एक और ग़ज़ल. संभवतः ग़ज़ल सुरेन्दर मलिक 'गुमनाम' की है, जिनकी बहुत सारी ग़ज़लें ग़ुलाम अली ने अपने 'हसीन लम्हे' सीरीज़ में गाई थीं. यह सीरीज़ और रेशमा का संग्रह 'दर्द' दोनों क़रीब - क़रीब एक साथ वेस्टन ने निकाले थे.
लो दिल की बात आप भी हम से छुपा गए
लगता है आप ग़ैरों की बातों में आ गए
मेरी तो इल्तिजा थी, रक़ीबों से मत मिलो
उनके बिछाए जाल में लो तुम भी आ गए
ये इश्क़ का सफ़र है, मंज़िल है इस की मौत
घायल जो करने आए थे, वही चोट खा गए
रोना था मुझ को उन के दामन में ज़ार-ज़ार
पलकों के मेरे अश्क़ उन्हीं को रुला गए
'गुमनाम' भूलता नहीं वो तेरी रहगुज़र
जिस रहगुज़र पे प्यार की शम्मः बुझा गए
पिछली पोस्ट का लिंक:
देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियां
Posted by Ashok Pande at 6:02 PM 2 comments
Labels: रेशमा, सुरेन्दर मलिक 'गुमनाम'
Sunday, July 13, 2008
ये तो कहो कभी इश्क़ किया है, जग में हुए हो रुसवा भी
रेशमा आपा का संग्रह 'दर्द' मेरे दिल के बहुत नज़दीक है. इस अलबम से मेरा परिचय पहली बार उनके असली रूप से हुआ. एक तो हमारे छोटे से कस्बे में उस मिजाज़ के कैसेट मिलते ही नहीं थे. हद से हद कभी कभी गु़लाम अली या मेहदी हसन साहब हाथ लग जाते थे. ज़्यादातर अच्छा संगीत हमें दोस्तों के दिल्ली-लखनऊ जैसे बड़े शहरों से आये मित्र-परिचितों के माध्यम से मिला करता था.हल्द्वानी जैसे निहायत कलाहीन नगर में रेशमा का यह कैसेट मिलना जैसे किसी चमत्कार की तरह घटा. कई सालों तक उसे लगातार-लगातार सुना गया और पांचेक साल पहले किन्हीं पारकर साहब की कृपा का भागी बन गया.
आज सुबह से इंशा जी की किताब पढ़ रहा था. उसमें 'देख हमारे माथे पर' ग़ज़ल वाले पन्ने पर पहुंचते ही दिल को रेशमा आपा की आवाज़ में इस ग़ज़ल की बेतरह याद उठना शुरू हुई.
कुछ दिन पहले अपने मित्र सिद्धेश्वर बाबू ने इस अलबम का ज़िक्र किया था. उम्मीद के साथ उन्हें फ़ोन लगाया पर उनके वाले कैसेट को भी पारकर साहब की नज़र लग चुकी थी.ज़रा देर बाद सिद्धेश्वर का फ़ोन आया कि मेल चैक करूं. अपने बाऊजी ने जाने कहां कहां की मशक्कत के बाद यह ग़ज़ल बाकायदा एम पी ३ फ़ॉर्मेट में बना कर मुझे मेल कर दी थी.
इस प्रिय गुरुवत मित्र को धन्यवाद कहते हुए आपकी सेवा में पेश है इब्न-ए-इंशा साहब की ग़ज़ल. इब्ने-ए-इंशा जी की एक नज़्म ग़ुलाम अली की और एक ग़ज़ल उस्ताद अमानत अली ख़ान की आवाज़ में आप पहले सुन ही चुके हैं:
देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियां
हम से है तेरा दर्द का नाता, देख हमें मत भूल मियां
अहल-ए-वफ़ा से बात न करना होगा तेरा उसूल मियां
हम क्यों छोड़ें इन गलियों के फेरों का मामूल मियां
ये तो कहो कभी इश्क़ किया है, जग में हुए हो रुसवा भी
इस के सिवा हम कुछ भी न पूछें, बाक़ी बात फ़िज़ूल मियां
अब तो हमें मंज़ूर है ये भी, शहर से निकलें रुसवा हों
तुझ को देखा, बातें कर लीं, मेहनत हुई वसूल मियां
(इस ग़ज़ल का मक़्ता बहुत सुन्दर है, जो यहां नहीं गाया गया:
इंशा जी क्या उज्र है तुमको, नक़्द-ए-दिल-ओ-जां नज़्र करो
रूपनगर के नाके पर ये लगता है महसूल मियां
दश्त-ए-तलब: इच्छा का जंगल, मामूल: दिनचर्या, नाका: चुंगी, महसूल: चुंगी पर वसूला जाने वाला टैक्स.
एक निवेदन: यदि आप में से किसी को मालूम हो कि मेराज-ए-ग़ज़ल में ग़ुलाम अली और आशा भोंसले की गाई 'फिर सावन रुत की पवन चली, तुम याद आए' किसने लिखी है, तो बताने का कष्ट ज़रूर करें. बन्दा अहसानमन्द रहेगा.)
Posted by Ashok Pande at 9:35 PM 10 comments
Labels: इब्ने इंशा, रेशमा