Showing posts with label ग़ालिब. Show all posts
Showing posts with label ग़ालिब. Show all posts

Saturday, September 13, 2008

बेसबब हुआ 'ग़ालिब' दुश्मन आसमाँ अपना








आज पेश है एक ग़ज़ल ग़ालिब की..... आवाज़ "ग़ज़लों की मलिका' बेगम अख्तर की :


ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयाँ अपना


ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयाँ अपना
बन गया रकीब आख़िर था जो राजदां अपना

मय वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ए-गै़र में यारब !
आज ही हुआ मंज़ूर, उन को इम्तेहाँ अपना

मंज़र एक बुलंदी पर और हम बना सकते
अर्श से उधर होता, काश कि मकाँ अपना

हम कहाँ के दाना थे, किस हुनर में यकता थे
बेसबब हुआ 'ग़ालिब' दुश्मन आसमाँ अपना