"जिगर" मुरादाबादी की एक ग़ज़ल .......
अभी अभी कहीं से वापस घर आया और ये सुना .... लगा कि पोस्ट करने में कोई बुराई नहीं ... ग़ज़ल मुझे बहुत पसंद है ............ और आवाज़ के बारे में कुछ कहना ज़रा अजीब सा लगता है मुझे ... जो संगीत के जानकार हैं वो ही कहा करें ......... मैं तो बस सुन के जीता हूँ ........
बस एक बात कहनी है ... ग़ज़ल का एक शेर आख़िर में पेश है जो इस version में नहीं है ..
"जिगर" मुरादाबादी
बेग़म अख्तर
दुनियाँ के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद
अब मुझ को नहीं कुछ भी मुहब्बत के सिवा याद
मैं शिक़वा ब लब था मुझे ये भी न रहा याद
शायद कि मेरे भूलने वाले ने किया याद
जब कोई हसीं होता है सरगर्म-ए-नवाज़िश
उस वक्त वो कुछ और भी आते हैं सिवा याद
मुद्दत हुई एक हादसा-ए-इश्क़ को लेकिन
अब तक है तेरे दिल के धड़कने की सदा याद
मैं तर्क़-ए-रह-ओ-रस्म-ए-जुनूँ कर ही चुका था
क्यों आ गई ऐसे में तेरी लग्जिश-ए-पा याद
और ये शेर :
क्या लुत्फ़ कि मैं अपना पता आप बताऊँ
कीजे कोई भूली हुई ख़ास अपनी अदा याद
Sunday, September 21, 2008
दुनियाँ के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद .... : "जिगर"
Posted by अमिताभ मीत at 1:59 PM 4 comments
Labels: जिगर मुरादाबादी, बेग़म अख़्तर
Saturday, September 13, 2008
बेसबब हुआ 'ग़ालिब' दुश्मन आसमाँ अपना

आज पेश है एक ग़ज़ल ग़ालिब की..... आवाज़ "ग़ज़लों की मलिका' बेगम अख्तर की :
ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयाँ अपना
ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयाँ अपना
बन गया रकीब आख़िर था जो राजदां अपना
मय वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ए-गै़र में यारब !
आज ही हुआ मंज़ूर, उन को इम्तेहाँ अपना
मंज़र एक बुलंदी पर और हम बना सकते
अर्श से उधर होता, काश कि मकाँ अपना
हम कहाँ के दाना थे, किस हुनर में यकता थे
बेसबब हुआ 'ग़ालिब' दुश्मन आसमाँ अपना
Posted by अमिताभ मीत at 4:26 AM 6 comments
Labels: ग़ालिब, बेग़म अख़्तर
Friday, August 8, 2008
ख़ुदा की शान है .....
"सखी !!"
मेरा जो कुछ है, सब "सखी" का है इस लिए आगाज़ इसी नाम से करता हूँ :
आज पहली बार यहाँ कुछ सुनाने की जुर्रत कर रहा हूँ .... इस लिए क्या कहूँ .... आज मेरी पसंद पे अख्तरी बाई "फैज़ाबादी" की आवाज़ में ये ग़ज़ल पेश है ...... मैं आज भी लाख कुछ भी, किसी को भी सुन लूँ, इस आवाज़, और इस अंदाज़ का जादू मुझ पे हमेशा की तरह तारी है ... शायद हमेशा रहेगा .....
एक छोटी सी ग़ज़ल पेश है :
ख़ुदा की शान है हम यूँ जलाए जाते हैं
हमारे सामने दुश्मन बुलाए जाते हैं
हमारे सामने हँस हँस के गै़र से मिलना
ये ही तो ज़ख्म कलेजे को खाए जाते हैं
हमारी बज़्म और उस बज़्म में है फर्क इतना
यहाँ चिराग़ वहाँ दिल जलाए जाते हैं
Posted by अमिताभ मीत at 11:35 PM 11 comments
Labels: बेग़म अख़्तर
Tuesday, July 15, 2008
काँटों का भी हक़ है कुछ आख़िर, कौन छुड़ाए अपना दामन

जनाब अली सिकन्दर उर्फ़ जिगर मुरादाबादी साहब की अविस्मरणीय ग़ज़ल को गा रही हैं बेग़म अख़्तर:
कोई ये कह दे गुलशन गुलशन
लाख बलाएँ एक नशेमन
फूल खिले हैं गुलशन गुलशन
लेकिन अपना अपना दामन
आज न जाने राज़ ये क्या है
हिज्र की रात और इतनी रोशन
रहमत होगी तालिब-ए-इसियाँ
रश्क करेगी पाकी-ए-दामन
काँटों का भी हक़ है कुछ आख़िर
कौन छुड़ाए अपना दामन
Posted by Ashok Pande at 5:07 PM 3 comments
Labels: जिगर मुरादाबादी, बेग़म अख़्तर
Tuesday, July 8, 2008
कभी तकदीर का मातम कभी दुनिया का गिला
बेग़म अख़्तर पर एक उम्दा पोस्ट भाई संजय पटेल लगा चुके हैं. आज उसी क्रम में सुनिये शकील बदायूंनी की एक बहुत मशहूर ग़ज़ल इसी अमर वाणी में:
ए मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यूं आज तेरे नाम पे रोना आया
यूं तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती थी
आज कुछ बात है कि शाम पे रोना आया
कभी तकदीर का मातम कभी दुनिया का गिला
मंज़िल-ए-इश्क़ में हर गाम पे रोना आया
जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का 'शकील'
हमको अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया
Posted by Ashok Pande at 3:42 PM 6 comments
Labels: बेग़म अख़्तर, शकील बदायूंनी