आज इस ब्लॉग पर आप के लिए ‘जिगर’ मुरादाबादी की ग़ज़ल है मल्लिका-ए-ग़ज़ल बेग़म अख्तर के स्वर में –
Tuesday, October 15, 2013
हिज्र की रात और इतनी रौशन
आज इस ब्लॉग पर आप के लिए ‘जिगर’ मुरादाबादी की ग़ज़ल है मल्लिका-ए-ग़ज़ल बेग़म अख्तर के स्वर में –
Posted by Ashok Pande at 8:00 AM 1 comments
Labels: जिगर मुरादाबादी, बेग़म अख्तर
Sunday, September 21, 2008
दुनियाँ के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद .... : "जिगर"
"जिगर" मुरादाबादी की एक ग़ज़ल .......
अभी अभी कहीं से वापस घर आया और ये सुना .... लगा कि पोस्ट करने में कोई बुराई नहीं ... ग़ज़ल मुझे बहुत पसंद है ............ और आवाज़ के बारे में कुछ कहना ज़रा अजीब सा लगता है मुझे ... जो संगीत के जानकार हैं वो ही कहा करें ......... मैं तो बस सुन के जीता हूँ ........
बस एक बात कहनी है ... ग़ज़ल का एक शेर आख़िर में पेश है जो इस version में नहीं है ..
"जिगर" मुरादाबादी
बेग़म अख्तर
दुनियाँ के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद
अब मुझ को नहीं कुछ भी मुहब्बत के सिवा याद
मैं शिक़वा ब लब था मुझे ये भी न रहा याद
शायद कि मेरे भूलने वाले ने किया याद
जब कोई हसीं होता है सरगर्म-ए-नवाज़िश
उस वक्त वो कुछ और भी आते हैं सिवा याद
मुद्दत हुई एक हादसा-ए-इश्क़ को लेकिन
अब तक है तेरे दिल के धड़कने की सदा याद
मैं तर्क़-ए-रह-ओ-रस्म-ए-जुनूँ कर ही चुका था
क्यों आ गई ऐसे में तेरी लग्जिश-ए-पा याद
और ये शेर :
क्या लुत्फ़ कि मैं अपना पता आप बताऊँ
कीजे कोई भूली हुई ख़ास अपनी अदा याद
Posted by अमिताभ मीत at 1:59 PM 4 comments
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Tuesday, July 15, 2008
काँटों का भी हक़ है कुछ आख़िर, कौन छुड़ाए अपना दामन
जनाब अली सिकन्दर उर्फ़ जिगर मुरादाबादी साहब की अविस्मरणीय ग़ज़ल को गा रही हैं बेग़म अख़्तर:
कोई ये कह दे गुलशन गुलशन
लाख बलाएँ एक नशेमन
फूल खिले हैं गुलशन गुलशन
लेकिन अपना अपना दामन
आज न जाने राज़ ये क्या है
हिज्र की रात और इतनी रोशन
रहमत होगी तालिब-ए-इसियाँ
रश्क करेगी पाकी-ए-दामन
काँटों का भी हक़ है कुछ आख़िर
कौन छुड़ाए अपना दामन
Posted by Ashok Pande at 5:07 PM 3 comments
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Sunday, July 6, 2008
मैं इन्तेहा-ए-शौक़ में घबरा के पी गया
'जिगर' मुरादाबादी की ग़ज़ल मुहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़:
साकी की हर निगाह पे बल खा के पी गया
लहरों से खेलता हुआ लहरा के पी गया
ज़ाहिद, ये मेरी शोखी-ए-रिन्दाना देखना
रहमत को बातों बातों में बहला के पी गया
ए रहमत-ए-तमाम, मेरी हर ख़ता मुआफ़
मैं इन्तेहा-ए-शौक़ में घबरा के पी गया
सरमस्ति-ए-अज़ल मुझे जब याद आ गई
दुनिया-ए-ऐतबार को ठुकरा के पी गया
Posted by Ashok Pande at 11:29 AM 3 comments
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Monday, June 30, 2008
बेगम अख़्तर : तबीयत इन दिनों बेगा़ना-ए-ग़म होती जाती है
मलिका–ए–ग़ज़ल बेगम अख़्तर ने ग़ज़ल को ज़िस तरह से अपनी आवाज़ से सँवारा है उससे बेशुमार दर्दी मुतमईन हैं.अब इस वीडियो को ही देखिये जो सुख़नसाज़ की बारादरी में आ पसरा है.किस बेसाख़्ता सादगी से बेगम अख़्तर इस कलाम को गा रहीं हैं.उनकी नाक का बेशक़ीमती हीरा उनकी गायकी के सामने कुछ कम ही दमकता नज़र आ रहा है. हाथ में बाजा लिये निर्विघ्न श्रवणा बेगम अख़्तर से रू-ब-रू होना किसी पावन तीर्थ का दर्शन करने जैसा है. लोग कहते हैं बेगम अख़्तर ग़ज़ल गातीं हैं ... ग़लत कहते हैं ... ग़ज़ल बेगम अख़्तर के गले में आन समाती है और आकर एक ख़ुशबू की मानिंद हमारे दिलो-दिमाग़ पर छा जाती है.
जब वे गा रही होती हैं तो ग़ज़ल उनकी होती है,शायर की नहीं. ये करामात सिर्फ़ उन्हीं के बूते का है. गाते वक़्त उनकी देहभाषा तो देखिये...जैसे ग़ज़ल को अपनी प्यारी सी बच्ची की तरह वे दुलार रहीं हों. बीच में सामईन की तरफ़ देख कर जिस तरह वे मुस्कुराती हैं लगता है पूछ रहीं हों अच्छी लगी न ये बात ...शुक्रिया. जहाँ जहाँ उनकी आवाज़ में पत्ती लगती है (जिसे कुछ दुष्ट लोग आवाज़ का फ़टना भी कहते हैं) समझिये बंदिश का स्वराभिषेक कर दिया बेगम अख़्तर ने.
बस अब अपनी वाचालता को विराम देते हुए एक ख़ास वक्तव्य:
महाराष्ट्र के जाने माने साहित्यकार पु. ल. देशपांडे बेगम अख़्तर के अनन्य मुरीद थे. अपने मित्रों वसंतराव देशपांडे, कुमार गंधर्व और रसिसराज रामू भैया दाते के साथ मिल अक्सर बेगम अख़्तर के रेकॉर्ड चूड़ी वाले बाजे पर सुनते. संघर्ष के दिन थे वे इन सभी के लिये. पु.ल. कहते: "बेगम अख़्तर के रेकॉर्ड्स सुनते वक़्त हमारी तार-तार दरी शहाना कालीन हो जाती और छत पर टंगा कंदील आलीशान झाड़फ़ानूस हो जाता."
तबीयत इन दिनों बेगा़ना-ए-ग़म होती जाती है
मेरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है
क़यामत क्या ये अय हुस्न-ए-दो आलम होती जाती है
कि महफ़िल तो वही है, दिलकशी कम होती जाती है
वही मैख़ाना-ओ-सहबा वही साग़र वही शीशा
मगर आवाज़-ए-नौशानोश मद्धम होती जाती है
वही है शाहिद-ओ-साक़ी मगर दिल बुझता जाता है
वही है शमः लेकिन रोशनी कम होती जाती है
वही है ज़िन्दगी अपनी 'जिगर' ये हाल है अपना
कि जैसे ज़िन्दगी से ज़िन्दगी कम होती जाती है
Posted by sanjay patel at 7:56 PM 10 comments
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