Saturday, July 12, 2008

दिल दीवाना तेरा भी है मेरा भी

जगजीत सिंह और लता मंगेशकर ने सन १९९१ में 'सजदा' अलबम जारी किया था. संभवतः ग़ुलाम अली-आशा भोंसले के अलबम 'मेराज-ए-ग़ज़ल' और मेहदी हसन - शोभा गुर्टू के 'तर्ज़' जैसे संग्रहों के बाद आने वाला इस तरह की जुगलबन्दी वाला यह सबसे बेहतरीन कलेक्शन था.

आज प्रस्तुत की जा रही ग़ज़ल है १९३२ में नागपुर में जन्मे शायर शाहिद कबीर साहब की. 'चारों ओर' (१९६८), 'मिट्टी का मकान' (१९७९) और 'पहचान' (२०००) उनके प्रकाशित संग्रहों के नाम हैं.

बहुत सादा धुन में बहुत इत्मीनान से गाई गई है ये कम्पोज़ीशन. आनन्द उठाइये:




ग़म का ख़ज़ाना तेरा भी है, मेरा भी
ये नज़राना तेरा भी है, मेरा भी

अपने ग़म को गीत बना कर गा लेना
राग पुराना तेरा भी है मेरा भी

मैं तुझको और तू मुझको समझाएं क्या
दिल दीवाना तेरा भी है मेरा भी

शहर में गलियों गलियों जिसका चरचा है
वो अफ़साना तेरा भी है मेरा भी

मैख़ाने की बात न कर वाइज़ मुझ से
आना जाना तेरा भी है मेरा भी

Friday, July 11, 2008

फ़कीरानः आए सदा कर चले, मियां ख़ुश रहो हम दुआ कर चले

कई दिनों बाद आज इस ग़ज़ल को सुनते हुए मुझे बारहा ऐसा अहसास होता रहा कि यह किसी बीती सहस्त्राब्दी की फ़िल्म का हिस्सा है. मैं लगातार अपने आप से पूछता रहा कि क्या फ़क़त छब्बीस साल पहले इस दर्ज़े की कालजयी कृतियों को किसी फ़िल्म में बढ़िया पॉपुलर धुनों में बांधने वाले संगीतकार इसी धरती पर हुआ करते थे? उनमें से कोई बचे भी हैं या नहीं? या सब कुछ मार्केट के नाम पर औने-पौने बेच-लूट दिया गया?

१९८२ में सागर सरहदी की बहुचर्चित फ़िल्म 'बाज़ार' से पेश है बाबा मीर तक़ी मीर की विख्यात ग़ज़ल. इस फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह, स्मिता पाटिल, फ़ारुख़ शेख़ और सुप्रिया पाठक की मुख्य भूमिकाएं थीं. खैयाम साहब का संगीत है और लता मंगेशकर की आवाज़.




दिखाई दिये यूं कि बेख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले

जबीं सजदा करते ही करते गई
हक़-ए-बन्दगी हम अदा कर चले

परस्तिश की यां तक कि अय बुत तुझे
नज़र में सभों की ख़ुदा कर चले

बहुत आरज़ू थी गली की तेरी
सो यां से लहू में नहा कर चले

Thursday, July 10, 2008

इस वक़्त कोई मेरी क़सम देखता मुझे

बहुत ही कम आयु में दिवंगत हो गए अद्वितीय गायक मास्टर मदन की एक ग़ज़ल आपने चन्द दिन पहले सुनी थी. जैसा मैंने वायदा किया था, सुनिये मास्टर मदन की आवाज़ में साग़र निज़ामी की एक और ग़ज़ल



हैरत से तक रहा है जहान-ए-वफ़ा मुझे
तुम ने बना दिया है मोहब्बत में क्या मुझे

हर मंज़िल-ए-हयात से गुम कर गया मुझे
मुड़ मुड़ के राह में वो तेरा देखना मुझे

कैसे ख़ुशी ने मौज को कश्ती बना दिया
होश-ए-ख़ुदा अब न ग़म-ए-नाख़ुदा मुझे

साक़ी बने हुए हैं वो साग़र शब-ए-विसाल
इस वक़्त कोई मेरी क़सम देखता मुझे

Tuesday, July 8, 2008

कभी तकदीर का मातम कभी दुनिया का गिला

बेग़म अख़्तर पर एक उम्दा पोस्ट भाई संजय पटेल लगा चुके हैं. आज उसी क्रम में सुनिये शकील बदायूंनी की एक बहुत मशहूर ग़ज़ल इसी अमर वाणी में:



ए मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यूं आज तेरे नाम पे रोना आया

यूं तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती थी
आज कुछ बात है कि शाम पे रोना आया

कभी तकदीर का मातम कभी दुनिया का गिला
मंज़िल-ए-इश्क़ में हर गाम पे रोना आया

जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का 'शकील'
हमको अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया

Monday, July 7, 2008

रुत आई पीले फूलों की, तुम याद आए

कोई बीसेक साल पहले ग़ुलाम अली और आशा भोंसले ने मिल जुल कर मेराज़-ए-ग़ज़ल नाम से एक बेहतरीन अल्बम जारी किया था. यह आज भी मेरे सर्वकालीन प्रियतम संग्रहों में है. उसी से सुनिए यह कम्पोज़ीशन:


फिर सावन रुत की पवन चली, तुम याद आए
फिर पत्तों की पाज़ेब बजी, तुम याद आए

फ़िर कंजें बोलीं घास के हर समुन्दर में
रुत आई पीले फूलों की, तुम याद आए

फिर कागा बोला घर के सूने आंगन में
फिर अमृत रस की बूंद पड़ी, तुम याद आए



(आभार: विनय)

Sunday, July 6, 2008

मैं इन्तेहा-ए-शौक़ में घबरा के पी गया

'जिगर' मुरादाबादी की ग़ज़ल मुहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़:



साकी की हर निगाह पे बल खा के पी गया
लहरों से खेलता हुआ लहरा के पी गया

ज़ाहिद, ये मेरी शोखी-ए-रिन्दाना देखना
रहमत को बातों बातों में बहला के पी गया

ए रहमत-ए-तमाम, मेरी हर ख़ता मुआफ़
मैं इन्तेहा-ए-शौक़ में घबरा के पी गया

सरमस्ति-ए-अज़ल मुझे जब याद आ गई
दुनिया-ए-ऐतबार को ठुकरा के पी गया

Saturday, July 5, 2008

जिस झोली में सौ छेद हुए, उस झोली को फैलाना क्या

पसन्दीदा शायर हैं जनाब इब्न-ए-इंशा साहब. उस्ताद अमानत अली ख़ान सुना रहे हैं अपने अलग क़िस्म के अन्दाज़ में इंशा साहब की एक नज़्म.



इंशाजी उठो अब कूच करो,
इस शहर में जी का लगाना क्या
वहशी को सुकूं से क्या मतलब,
जोगी का नगर में ठिकाना क्या

इस दिल के दरीदा दामन में
देखो तो सही, सोचो तो सही
जिस झोली में सौ छेद हुए
उस झोली को फैलाना क्या

शब बीती चाँद भी डूब चला
ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े पे
क्यों देर गये घर आये हो
सजनी से करोगे बहाना क्या

जब शहर के लोग न रस्ता दें
क्यों बन में न जा बिसराम करें
दीवानों की सी न बात करे
तो और करे दीवाना क्या

इंशा साहब की एक और मशहूर नज़्म आप ग़ुलाम अली की आवाज़ में सुख्ननसाज़ पर यहां सुन सकते हैं:

ये बातें झूठी बातें हैं

Friday, July 4, 2008

मेरी दुनिया मुन्तज़िर है आपकी, अपनी दुनिया छोड़ कर आ जाइये

दो ढाई साल की उम्र से गाना शुरू कर देने वाले और मात्र चौदह साल की नन्ही आयु में स्वर्गवासी हो गए मास्टर मदन की प्रतिभा का लोहा स्वयं कुन्दन लाल सह्गल ने भी माना था. उनका जन्म २८ दिसम्बर १९२७ को जलन्धर के एक गांव खा़नखा़ना में हुआ था, जो प्रसंगवश अकबर के दरबार की शान अब्दुर्ररहीम खा़नखा़ना की भी जन्मस्थली था. ५ जून १९४२ को हुई असमय मौत से पहले उनकी आवाज़ में आठ रिकार्डिंग्स हो चुकी थीं. 


ये ग़ज़ल गुलज़ार और जगजीत सिंह की कमेन्ट्री के साथ कुछ साल पहले एच एम वी द्वारा 'फ़िफ़्टी ईयर्स आफ़ पापुलर गज़ल' के अन्तर्गत जारी हुई थी. जगजीत सिंह के मुताबिक मास्टर मदन सिर्फ़ तेरह साल जिए लेकिन यह सत्य नहीं है. इस के अलावा इस अल्बम में बताया गया है कि इन गज़लों का संगीत मास्टर मदन का है. यह भी सत्य नहीं है. ये गज़लें १९३४ में रिकार्ड की गई थीं यानी तब उनकी उम्र ७ साल थी. असल में इन गज़लों को १९४७ में 'मिर्ज़ा साहेबां' फ़िल्म का संगीत देने वाले पं अमरनाथ ने स्वरबद्ध किया था. सागर निज़ामी की इन गज़लों में मास्टर मदन की आवाज़ का साथ स्वयं पं अमरनाथ हार्मोनियम पर दे रहे हैं. तबले पर हीरालाल हैं और वायलिन पर मास्टर मदन के अग्रज मास्टर मोहन:



यूं न रह रह के हमें तरसाइए
आइये, आ  जाइये, आ जाइये
 
फिर वही दानिश्ता ठोकर खाइये
फिर मेरे आग़ोश में गिर जाइये
 
मेरी दुनिया मुन्तज़िर है आपकी
अपनी दुनिया छोड़ कर आ जाइये
 
ये हवा 'साग़र' ये हल्की चांदनी
जी में आता है यहीं मर जाइये
 
(मास्टर मदन की एक और ग़ज़ल आप को जल्दी सुनने को मिलेगी यहीं)

Thursday, July 3, 2008

गै़र के सामने यूं होते हैं शिकवे मुझसे


डॉक्टर रोशन भारती साहब की एक ग़ज़ल आप सुख़नसाज़ में सुन चुके हैं. टाइम्स म्यूज़िक द्वारा जारी उनके अल्बम 'दाग़' से प्रस्तुत कर रहा हूं एक और ग़ज़ल



आप जिन जिन को हदफ़ तीर-ए-नज़र करते हैं
रात दिन हाय जिगर हाय जिगर करते हैं

गै़र के सामने यूं होते हैं शिकवे मुझसे
देखते हैं वो उधर बात इधर करते हैं

दर-ओ-दीवार से भी रश्क मुझे आता है
गौर से जब किसी जानिब वो नज़र करते हैं

एक तो नश्शा-ए-मय उस पे नशीली आंखें
होश उड़ते हैं जिधर को वो नज़र करते हैं


रोशन जी के बारे में जानने हेतु उनकी वैबसाइट पर जाया जा सकता है. आज बड़ौदा में उनकी एक कन्सर्ट भी है. उनकी पिछली ग़ज़ल का लिंक ये रहा:

दिल गया, तुमने लिया हम क्या करें

Tuesday, July 1, 2008

इक ज़रा दिल के क़रीब आओ तो कुछ चैन पड़े

कुछ दिन पहले यहां आपने मेहदी हसन साहब की आवाज़ में एक अल्बम 'तर्ज़' से एक ग़ज़ल सुनी थी. गणेश बिहारी 'तर्ज़' की ग़ज़लों को ललित सेन ने संगीतबद्ध किया था. उसी से सुनिये इस दफ़ा शोभा गुर्टू को. कमेन्ट्री है नौशाद साहब की:



इक ज़रा दिल के क़रीब आओ तो कुछ चैन पड़े
जाम को जाम से टकराओ तो कुछ चैन पड़े

जी उलझता है बहुत नग़्म-ए-रंगीं सुनकर
गीत एक दर्द भरा गाओ तो कुछ चैन पड़े

बैठे-बैठे तो हर इक मौज से दिल दहलेगा
बढ़ के तूफ़ानों से टकराओ तो कुछ चैन पड़े

दाग़ के शेर जवानी में भले लगते हैं
मीर की कोई ग़ज़ल गाओ तो कुछ चैन पड़े

याद-ए-अय्याम-ए-गुज़िस्ता से इजाज़त लेकर
'तर्ज़' कुछ देर को सो जाओ तो कुछ चैन पड़े