दोस्तो मुझे बस एक बात मालूम है इस पोस्ट के बारे में : ये आवाज़ शोभा गुर्टू की है.
इस लिए कुछ कहूँगा नहीं, मैं इस क़ाबिल ही नहीं. मैं पहले ही अर्ज़ कर चुका हूँ कि संगीत का इल्म मुझे रत्ती भर नहीं. बस नशा है .... इस के बिना जिया नहीं जाता ....
लेकिन क्या है ये जो छोड़ता नहीं मुझे ....
Saturday, September 6, 2008
तरसत जियरा हमार नैहर में ....
Posted by अमिताभ मीत at 8:53 PM 7 comments
Labels: शोभा गुर्टू
Tuesday, September 2, 2008
रफ़ी साहब बता रहे है-कितनी राहत है दिल टूट जाने के बाद

मोहम्मद रफ़ी फ़िल्मी गीतों के अग्रणी गायक न होते तो क्या होते.शर्तिया कह सकता हूँ किसी घराने के बड़े उस्ताद होते या बेगम अख़्तर,तलत मेहमूद,मेहंदी हसन और जगजीतसिंह की बलन के ग़ज़ल गायक होते.भरोसा न हो तो मुलाहिज़ा फ़रमाइये ये ग़ज़ल .क्या तो सुरों की परवाज़ है और क्या सार-सम्हाल की है शायरी की.रफ़ी साहब ने इन रचनाओं को तब प्रायवेट एलबम्स की शक़्ल में रेकॉर्ड किया था जब किशोरकुमार नाम का सुनामी राजेश खन्ना नाम के सुपर स्टार को गढ़ रहा था.रफ़ी साहब ने इस समय का बहुत रचनात्मक उपयोग किया. स्टेज शोज़ किये,भजन रेकॉर्ड किये और रेकॉर्ड की चंद बेहतरीन ग़ज़लें.हम कानसेन उपकृत हुए क्योंकि दिल को सुकून देने वाली आवाज़ हमारे कलेक्शन्स को सुरीला बनाती रही.ऐसी कम्पोज़िशन्स को गा गा कर न जाने कितने गुलूकारों ने अपनी रोज़ी-रोटी कमाई है.अहसान आपका मोहम्मद रफ़ी साहब आपका हम सब पर.और हाँ इस ग़ज़ल को सुनते हुए ताज अहमद ख़ान साहब के कम्पोज़िशन की भी दाद दीजिये,किस ख़ूबसूरती से उन्होंने सितार और सारंगी का इस्तेमाल किया है...हर शेर पर वाह वाह कीजिये हुज़ूर..रफ़ी साहब जो गा रहे हैं.
Posted by sanjay patel at 4:00 PM 6 comments
Labels: ग़ज़ल, मोहम्मद रफ़ी, शमीम जयपुरी.
Monday, September 1, 2008
एक आवारा सी आवाज़
इस आवाज़ का असर मुझ पर तो कुछ अजब सा होता है ..... आप पर ?
"शब की तन्हाई में इक बार सुन के देखा था
उस की आवाज़ का असर वो था, कि अब तक है..."
Posted by अमिताभ मीत at 5:19 PM 9 comments
Labels: रेशमा
Saturday, August 30, 2008
अल्लाह करे के तुम कभी ऐसा न कर सको
ग़ज़ल गायकी की जो जागीरदारी मोहतरमा फ़रीदा ख़ानम को मिली है वह शीरीं भी है और पुरकशिश भी. वे जब गा रही हों तो दिल-दिमाग़ मे एक ऐसी ख़ूशबू तारी हो जाती है कि लगता है इस ग़ज़ल को रिवाइंड कर कर के सुनिये या निकल पड़िये एक ऐसी यायावरी पर जहाँ आपको कोई पहचानता न हो और फ़रीदा आपा की आवाज़ आपको बार बार हाँट करती रहे. यक़ीन न हो तो ये ग़ज़ल सुनिये...
Posted by sanjay patel at 12:33 AM 3 comments
Labels: फ़रीदा ख़ानम
Tuesday, August 26, 2008
तुम्हें भुलाने में शायद हमें ज़माने लगे-यादों में फ़राज़

शदीद ग़म के और की-बोर्ड पर काँपती उंगलियों से लिखता हूँ कि आलातरीन शायर
अहमद फ़राज़ साहब नहीं रहे. वे अपनी ज़िन्दगी में शायरी का एक ऐसा मरकज़ बन गए थे जहाँ तक पहुँच पाना दीगर लोगों के लिये नामुमकिन सा लगता है. मैंने बार बार लिखा भी है कि रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आ , इस एक ग़ज़ल को मैं ग्लोबल ग़ज़ल ही कहता हूँ.फ़राज़ साहब ने मुशायरों में होने वाली राजनीति के चलते स्टेज से हमेशा एक मुसलसल दूरी बनाए रखी. जैसा कि होना चाहिये अदब की दुनिया के अलावा समाज और इंसानियत के हक़ में शायर और अदीब खड़े नज़र आने चाहिये सो फ़राज़ साहब हमेशा कमिटेड रहे. ज़ाहिर है सत्ता से उनकी कभी नहीं बनी.भारत-पाकिस्तान की एकता और तहज़ीब के हवाले से अमन और भाईचारे की ख़िदमत उनकी ज़िन्दगी के उसूलों में शुमार रहा. बिला शक कहा जा सकता है कि फ़राज़ साहब के परिदृश्य पर लोकप्रिय होने के बाद ग़ज़ल को एक नया मेयार मिला. मौसीक़ी की दुनिया ने हमेशा उनकी ग़ज़लों का ख़ैरमक्दम किया और जिस तरह की मुहब्बत और बेक़रारी उनके कलाम के लिये देखी जाती रही वह किसी शायर को नसीब से ही मिलती है.
अहमद फ़राज़ साहब की ही एक ग़ज़ल से इस अज़ीम शायर को सुख़नसाज़ की
भावपूर्ण श्रध्दांजलि..
ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे
तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे
दिल धड़कता नहीं तपकता है
कल जो ख़्वाहिश थी आबला है मुझे
हमसफ़र चाहिये हुजूम नहीं
इस मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे
कोहकन हो कि क़ैस हो कि फ़राज़
सब में इस शख़्स ही मिला है मुझे
(आबला:छाला/तपकना:जब शरीर कि किसी हिस्से में दर्द हो और वो दर्द दिल धड़कने से भी दुखे/कोहकन:फ़रहाद जिसने शीरीं के लिये पहाड़ काटा था)
Posted by sanjay patel at 1:35 PM 9 comments
Labels: अहमद फ़राज़
Saturday, August 23, 2008
एक सुब्ह का आगाज़ इस आवाज़ से भी : बेग़म आबिदा परवीन
फैज़ अहमद "फैज़" ..... बेग़म आबिदा परवीन .........
अब इस से आगे मैं क्या कहूँ ?? ( इस से इलावा कि बात शाम की है.....)
शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ, आई और आ के टल गई
Boomp3.com
शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ, आई और आ के टल गई
दिल था कि फिर बहल गया, जाँ थी कि फिर संभल गई
बज़्म-ए-ख़याल में तेरे, हुस्न की शम्मा जल गई
दर्द का चाँद बुझ गया, हिज्र की रात ढल गई
जब तुझे याद कर लिया, सुब्ह महक महक उठी
जब तेरा ग़म जगा लिया, रात मचल मचल गई
दिल से तो हर मुआमिला, कर के चले थे साफ़ हम
कहने में उन के सामने, बात बदल बदल गई
आख़िर-ए-शब के हमसफ़र, "फैज़" न जाने क्या हुए
रह गई किस जगह सबा, सुब्ह किधर निकल गई
Posted by अमिताभ मीत at 8:33 AM 6 comments
Labels: आबिदा परवीन, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
Friday, August 22, 2008
इन्हें कोई काश ये बता दे, मकाम ऊंचा है सादगी का
यूनुस भाई ने आज जो सिलसिला चालू किया है, मुझे उम्मीद है सुख़नसाज़ पर अब और भी विविधतापूर्ण संगीत की ख़ूब जगह बनेगी. ५ मई १९६७ को रिलीज़ हुई पाकिस्तानी फ़िल्म 'देवर भाभी' से एक गीत सुनिये आज मेहदी हसन साहब की आवाज़ में. हसन तारिक़ द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म में रानी और वहीद मुराद मुख्य भूमिकाओ में थे. फ़ैयाज़ हाशमी के गीतों को इनायत हुसैन ने संगीतबद्ध किया था.
ये लोग पत्थर के दिल हैं जिनके
नुमाइशी रंग में हैं डूबे
ये काग़ज़ी फूल जैसे चेहरे, मज़ाक उड़ाते हैं आदमी का
इन्हें कोई काश ये बता दे, मकाम ऊंचा है सादगी का
इन्हें भला ज़ख़्म की ख़बर क्या कि तीर चलते हुए न देखा
उदास आंखों में आरज़ू का ख़ून जलते हुए न देखा
अंधेरा छाया है दिल के आगे हसीन ग़फ़लत की रोशनी का
ये काग़ज़ी फूल जैसे चेहरे, मज़ाक उड़ाते हैं आदमी
इन्हें कोई काश ये बता दे, मकाम ऊंचा है सादगी का
ये सहल-ए-गुलशन में जब गए हैं, बहार ही लूट ले गए हैं
जहां गए हैं ये दो दिलों का क़रार ही लूट ले गए हैं
ये दिल दुखाना है इनका शेवा, इन्हें है अहसास कब किसी का
ये काग़ज़ी फूल जैसे चेहरे, मज़ाक उड़ाते हैं आदमी
इन्हें कोई काश ये बता दे, मकाम ऊंचा है सादगी का
मैं झूठ की जगमगाती महफ़िल में आज सच बोलने लगा हूं
मैं हो के मजबूर अपने गीतों में ज़हर फिर घोलने लगा हूं
ये ज़हर शायद उड़ा दे नश्शा ग़ुरूर में डूबी ज़िन्दगी का
ये काग़ज़ी फूल जैसे चेहरे, मज़ाक उड़ाते हैं आदमी
इन्हें कोई काश ये बता दे, मकाम ऊंचा है सादगी का
Posted by Ashok Pande at 8:00 PM 6 comments
Labels: फ़ैयाज़ हाशमी, मेहदी हसन के फ़िल्मी गीत
मेहदी हसन साहब सूफि़यान अंदाज़ में कह रहे हैं--अच्छी बात करो, अच्छी बात कहो ।।
सुखनसाज़ पर ये मेरी पहली हाजिरी है । और इसे ख़ास बनाने की कोशिश में यहां आने में इतनी देर लग गई । वरना अशोक भाई ने तो कई हफ्तों पहले मुझे सुख़नसाजि़या बना डाला था । बहरहाल, मैंने अपने लिए सुखनसाज़ी के कुछ पैमाने तय किये हैं । उन पर अमल करते हुए ही इस चबूतरे से साज़ छेड़े जाएंगे ।
मेहदी हसन साहब को मैंने तब पहली बार जाना और सुना जब मैं स्कूल में हुआ करता था । एक दोस्त ने कैसेट की शक्ल में एक ऐसी आवाज़ मुझे दे दी, जिसने जिंदगी की खुशनसीबी को कुछ और बढ़ा दिया । उसके बाद मेहदी हसन को सुनने के लिए मैं शाम चार बजे के आसपास अपने रेडियो पर शॉर्टवेव पर रेडियो पाकिस्तान की विदेश सेवा को ट्यून किया जाने लगा । उस समय अकसर पाकिस्तानी फिल्मों के गाने सुनवाए जाते थे । ये गाना पहली बार मैंने तभी सुना था । उसके बाद फिर भोपाल में मैग्नासाउंड पर निकला एक कैसेट हाथ लगा जिसमें उस्ताद जी के पाकिस्तानी फिल्मों के गाए गाने थे । और हाल ही में मुंबई में एक सी.डी. हाथ लग गयी जिसमें उस्ताद जी के कई फिल्मी गीत हैं साथ ही ग़ज़लें भी ।
तो आईये सुख़नसाज़ पर अपने प्रिय गायक, दुनिया के एक रोशन चराग़, ग़ज़लों की दुनिया के शहंशाह उस्ताद मेहदी हसन का गाया एक फिल्मी गीत सुना जाए । आपको बता दें कि ये सन 1976 में आई पाकिस्तानी फिल्म 'फूल और शोले' का गाना है । इसके मुख्य कलाकार थे ज़ेबा और मोहम्मद अली । मुझे सिर्फ़ इतना पता चल सका है कि इस फिल्म के संगीतकार मुहम्मद अशरफ़ थे । अशरफ़ साहब ने मेहदी हसन के कुल 124 गाने स्वरबद्ध किए हैं ।
मैं जब भी इस गाने को सुनता हूं यूं लगता है मानो को दरवेश, कोई फ़कीर गांव के बच्चों को सिखा रहा है कि दुनिया में कैसे जिया जाता है । नैतिकता का रास्ता कौन सा है । हालांकि नैतिक शिक्षा के ये वो पाठ हैं जिन्हें हम बचपन से सुनते आ रहे हैं । पर जब इन्हें उस्ताद मेहदी हसन की आवाज़ मिलती है तो यही पाठ नायाब बन जाता है । अशरफ साहब ने इस गाने में गिटार और बांसुरी की वो तान रखी है कि दिल अश अश कर उठता है । तो सुकून के साथ सुनिए सुखनसाज़ की ये पेशक़श ।
अच्छी बात कहो, अच्छी बात सुनो,
अच्छाई करो, ऐसे जियो
चाहे ये दुनिया बुराई करे
तुम ना बुराई करो ।।
दुख जो औरों के लेते हैं
मर के भी जिंदा रहते हैं
आ नहीं सकतीं उसपे बलाएं
लेता है जो सबकी दुआएं
अपने हों या बेगाने हों
सबसे भलाई करो ।। अच्छी बात करो ।।
चीज़ बुरी होती है लड़ाई
होता है अंजाम तबाही
प्यार से तुम सबको अपना लो
दुश्मन को भी दोस्त बना लो
भटके हुए इंसानों की तुम
राहनुमाई करो ।। अच्छी बात करो ।।
सुखनसाज़ पर उस्ताद मेहदी हसन के फिल्मी गीतों और उनके लिए दुआओं का सिलसिला जारी रहेगा ।Posted by Yunus Khan at 8:57 AM 5 comments
Labels: मेहदी हसन के फ़िल्मी गीत
Thursday, August 21, 2008
ख़ुद तुम्हें चाक-ए-गरेबां का शऊर आ जाएगा, तुम वहां तक आ तो जाओ हम जहां तक आ गए
अल्बम 'मेराज-ए-ग़ज़ल' से प्रस्तुत है एक और शानदार ग़ज़ल आशा भोंसले की आवाज़ में:
हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-नेहां तक आ गए
हम तो दिल तक चाहते थे, तुम तो जां तक आ गए
ज़ुल्फ़ में ख़ुशबू न थी, या रंग आरिज़ में न था
आप किस की जुस्तजू में गुलसितां तक आ गए
ख़ुद तुम्हें चाक-ए-गरेबां का शऊर आ जाएगा
तुम वहां तक आ तो जाओ हम जहां तक आ गए
उनकी पलकों पे सितारे, अपने होटों पे हंसी
क़िस्सा-ए-ग़म कहते-कहते हम यहां तक आ गए
Posted by Ashok Pande at 7:32 PM 3 comments
Labels: आशा भोंसले
Saturday, August 16, 2008
बिछुआ बाजे रे ... ओ बलम - इक़बाल बानो
दोस्तो संगीत का कोई ज्ञान नहीं है मुझे .... दो कौड़ी का नहीं. बस लत है सुनने की ...
और जब इक़बाल बानो की आवाज़ में ऐसा कुछ हो ... तो लगता है कि कुछ और लोग भी सुनें.
तो आज सुनिए ये ग़ज़ब .... "बिछुआ बाजे रे ... ओ बलम...............".
Boomp3.com
Posted by अमिताभ मीत at 9:28 PM 6 comments
Labels: इक़बाल बानो