"फ़ैज़" साहब की ग़ज़ल हो और आबिदा परवीन की आवाज़, तो माहौल कुछ अलग-सा बन जाता है. पेश है एक ग़ज़ल ...........
आबिदा परवीन - फ़ैज़ अहमद "फ़ैज़"
"नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही"
नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही
न तन में खून फ़राहम है न अश्क आंखों में
नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब है बे-वज़ू ही सही
किसी तरह तो जमे बज़्म मैक़दे वालो
नहीं जो बादा-ओ-साग़र तो हा-ओ-हू ही सही
गर इंतज़ार कठिन है तो जब तक ऐ दिल
किसी के वादा-ए-फ़र्दा की गुफ्तगू ही सही
दयार-ए-गै़र में मरहम अगर नहीं कोई
तो "फैज़" ज़िक्र-ए-वतन अपने रूबरू ही सही
Wednesday, October 22, 2008
नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही
Posted by अमिताभ मीत at 6:21 AM 7 comments
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Saturday, August 23, 2008
एक सुब्ह का आगाज़ इस आवाज़ से भी : बेग़म आबिदा परवीन
फैज़ अहमद "फैज़" ..... बेग़म आबिदा परवीन .........
अब इस से आगे मैं क्या कहूँ ?? ( इस से इलावा कि बात शाम की है.....)
शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ, आई और आ के टल गई
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शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ, आई और आ के टल गई
दिल था कि फिर बहल गया, जाँ थी कि फिर संभल गई
बज़्म-ए-ख़याल में तेरे, हुस्न की शम्मा जल गई
दर्द का चाँद बुझ गया, हिज्र की रात ढल गई
जब तुझे याद कर लिया, सुब्ह महक महक उठी
जब तेरा ग़म जगा लिया, रात मचल मचल गई
दिल से तो हर मुआमिला, कर के चले थे साफ़ हम
कहने में उन के सामने, बात बदल बदल गई
आख़िर-ए-शब के हमसफ़र, "फैज़" न जाने क्या हुए
रह गई किस जगह सबा, सुब्ह किधर निकल गई
Posted by अमिताभ मीत at 8:33 AM 6 comments
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Wednesday, June 25, 2008
चले भी आओ कि गुलशन का करोबार चले

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ साहब की इस कालजयी ग़ज़ल को स्वर दे रहे हैं उस्ताद मेहदी हसन
गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का करोबार चले
क़फ़स उदास है यारो, सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले
जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिज्राँ
हमारे अश्क़ तेरी आक़बत सँवार चले
कभी तो सुब्ह तेरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले
मक़ाम 'फै़ज़' कोई राह में जंचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले
(गुल: फूल, बाद-ए-नौबहार: नये वसन्त की हवा, कफ़स: पिंजरा, सबा: सुबह की समीर, बहर-ए ख़ुदा: भगवान के वास्ते, शब-ए-हिज्रां: विरह की रात, अश्क: आंसू, आक़बत: परलोक, कू-ए-यार: प्रेमिका की गली, सू-ए-दार: फांसी का फ़न्दा)
फ़ैज़ साहब की कुछ अन्य रचनाएं दिलचस्प आवाज़ों में इन्हीं दिनों एकाधिक ब्लॉग्स पर आई हैं. फ़िलहाल ये लिंक ज़रूर देखिये:
ये कौन सख़ी हैं जिनके लुहू की अशरफ़ियाँ छन-छन-छन-छन
और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
Posted by Ashok Pande at 12:01 PM 8 comments
Labels: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, मेहदी हसन