उस्ताद ख़ान साहेब मेहदी हसन के स्वर में सुनें एक और फ़िल्मी गीत:
कहा जो मरने को मर गए हम, कहा जो जीने को जी उठे हम
अब और क्या चाहता है ज़ालिम, तेरे इशारों पर चल रहे हम
किसी से कुछ भी कहा नहीं है, न जाने कैसे ख़बर हुई है
जो दर्द सीने में पल रहे थे वो गीत बन के मचल रहे हैं
न आये लब पे तेरी कहानी, तबाह कर दी ये ज़िन्दगानी
किसी ने पूछा कि बात क्या है, तो दुख हंसी में बदल गए हैं
ये रात जाने कटेगी कैसे, ये प्यास जाने बुझेगी कैसे
कहीं पे रोशन वफ़ा की शम्में, कहीं पे परवाने जल रहे हैं
Tuesday, September 23, 2008
किसी ने पूछा कि बात क्या है, तो दुख हंसी में बदल गए हैं
Posted by Ashok Pande at 6:33 PM 1 comments
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Monday, September 22, 2008
हमसे अच्छे पवन चकोरे, जो तेरे बालों से खेलें
मेहदी हसन साहब का एक ये मूड भी देखिये. इस रंग के गीत भी खां साहब के यहां इफ़रात में पाये जाते हैं.
इस गीत को पेश करता हुआ मैं अपनी एक गुज़ारिश भी आप के सामने रखता हूं - अगर आप बहुत कलावादी या शुद्धतावादी हैं तो कृपा करें और इस गीत को न सुनें, लेकिन मेहदी हसन को मोहब्बत करते हैं तो पांच मिनट ज़रूर दें. सुनिये "ओ मेरे सांवरे सलोने मेहबूबा"
*आज सुख़नसाज़ के वरिष्ठतम साजिन्दे संजय पटेल का जन्मदिन भी है. यह मीठा गीत में उन्हीं की नज़्र करता हूं.
Posted by Ashok Pande at 11:34 AM 10 comments
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Monday, September 8, 2008
तुम्हारे बाद किसी रात की सहर न हुई
मेहदी हसन साहब की एक प्रसिद्ध फ़िल्मी कम्पोज़ीशन प्रस्तुत है:
ख़ुदा करे कि मोहब्बत में ये मक़ाम आये
किसी का नाम लूं लब पे तुम्हारा नाम आए
कुछ इस तरह से जिए ज़िन्दगी बसर न हुई
तुम्हारे बाद किसी रात की सहर न हुई
सहर नज़र से मिले, ज़ुल्फ़ ले के शाम आए
किसी का नाम लूं लब पे तुम्हारा नाम आए
ख़ुद अपने घर में वो मेहमान बन के आए हैं
सितम तो देखिए अनजान बन के आए हैं
हमारे दिल की तड़प आज कुछ तो काम आए
किसी का नाम लूं लब पे तुम्हारा नाम आए
वही है साज़ वही गीत वही मंज़र
हरेक चीज़ वही है नहीं हो तुम वो मगर
उसी तरह से निगाहें उठें सलाम आए
किसी का नाम लूं लब पे तुम्हारा नाम आए
Posted by Ashok Pande at 5:58 PM 5 comments
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Friday, August 22, 2008
इन्हें कोई काश ये बता दे, मकाम ऊंचा है सादगी का
यूनुस भाई ने आज जो सिलसिला चालू किया है, मुझे उम्मीद है सुख़नसाज़ पर अब और भी विविधतापूर्ण संगीत की ख़ूब जगह बनेगी. ५ मई १९६७ को रिलीज़ हुई पाकिस्तानी फ़िल्म 'देवर भाभी' से एक गीत सुनिये आज मेहदी हसन साहब की आवाज़ में. हसन तारिक़ द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म में रानी और वहीद मुराद मुख्य भूमिकाओ में थे. फ़ैयाज़ हाशमी के गीतों को इनायत हुसैन ने संगीतबद्ध किया था.
ये लोग पत्थर के दिल हैं जिनके
नुमाइशी रंग में हैं डूबे
ये काग़ज़ी फूल जैसे चेहरे, मज़ाक उड़ाते हैं आदमी का
इन्हें कोई काश ये बता दे, मकाम ऊंचा है सादगी का
इन्हें भला ज़ख़्म की ख़बर क्या कि तीर चलते हुए न देखा
उदास आंखों में आरज़ू का ख़ून जलते हुए न देखा
अंधेरा छाया है दिल के आगे हसीन ग़फ़लत की रोशनी का
ये काग़ज़ी फूल जैसे चेहरे, मज़ाक उड़ाते हैं आदमी
इन्हें कोई काश ये बता दे, मकाम ऊंचा है सादगी का
ये सहल-ए-गुलशन में जब गए हैं, बहार ही लूट ले गए हैं
जहां गए हैं ये दो दिलों का क़रार ही लूट ले गए हैं
ये दिल दुखाना है इनका शेवा, इन्हें है अहसास कब किसी का
ये काग़ज़ी फूल जैसे चेहरे, मज़ाक उड़ाते हैं आदमी
इन्हें कोई काश ये बता दे, मकाम ऊंचा है सादगी का
मैं झूठ की जगमगाती महफ़िल में आज सच बोलने लगा हूं
मैं हो के मजबूर अपने गीतों में ज़हर फिर घोलने लगा हूं
ये ज़हर शायद उड़ा दे नश्शा ग़ुरूर में डूबी ज़िन्दगी का
ये काग़ज़ी फूल जैसे चेहरे, मज़ाक उड़ाते हैं आदमी
इन्हें कोई काश ये बता दे, मकाम ऊंचा है सादगी का
Posted by Ashok Pande at 8:00 PM 6 comments
Labels: फ़ैयाज़ हाशमी, मेहदी हसन के फ़िल्मी गीत
मेहदी हसन साहब सूफि़यान अंदाज़ में कह रहे हैं--अच्छी बात करो, अच्छी बात कहो ।।
सुखनसाज़ पर ये मेरी पहली हाजिरी है । और इसे ख़ास बनाने की कोशिश में यहां आने में इतनी देर लग गई । वरना अशोक भाई ने तो कई हफ्तों पहले मुझे सुख़नसाजि़या बना डाला था । बहरहाल, मैंने अपने लिए सुखनसाज़ी के कुछ पैमाने तय किये हैं । उन पर अमल करते हुए ही इस चबूतरे से साज़ छेड़े जाएंगे ।

मेहदी हसन साहब को मैंने तब पहली बार जाना और सुना जब मैं स्कूल में हुआ करता था । एक दोस्त ने कैसेट की शक्ल में एक ऐसी आवाज़ मुझे दे दी, जिसने जिंदगी की खुशनसीबी को कुछ और बढ़ा दिया । उसके बाद मेहदी हसन को सुनने के लिए मैं शाम चार बजे के आसपास अपने रेडियो पर शॉर्टवेव पर रेडियो पाकिस्तान की विदेश सेवा को ट्यून किया जाने लगा । उस समय अकसर पाकिस्तानी फिल्मों के गाने सुनवाए जाते थे । ये गाना पहली बार मैंने तभी सुना था । उसके बाद फिर भोपाल में मैग्नासाउंड पर निकला एक कैसेट हाथ लगा जिसमें उस्ताद जी के पाकिस्तानी फिल्मों के गाए गाने थे । और हाल ही में मुंबई में एक सी.डी. हाथ लग गयी जिसमें उस्ताद जी के कई फिल्मी गीत हैं साथ ही ग़ज़लें भी ।
तो आईये सुख़नसाज़ पर अपने प्रिय गायक, दुनिया के एक रोशन चराग़, ग़ज़लों की दुनिया के शहंशाह उस्ताद मेहदी हसन का गाया एक फिल्मी गीत सुना जाए । आपको बता दें कि ये सन 1976 में आई पाकिस्तानी फिल्म 'फूल और शोले' का गाना है । इसके मुख्य कलाकार थे ज़ेबा और मोहम्मद अली । मुझे सिर्फ़ इतना पता चल सका है कि इस फिल्म के संगीतकार मुहम्मद अशरफ़ थे । अशरफ़ साहब ने मेहदी हसन के कुल 124 गाने स्वरबद्ध किए हैं ।
मैं जब भी इस गाने को सुनता हूं यूं लगता है मानो को दरवेश, कोई फ़कीर गांव के बच्चों को सिखा रहा है कि दुनिया में कैसे जिया जाता है । नैतिकता का रास्ता कौन सा है । हालांकि नैतिक शिक्षा के ये वो पाठ हैं जिन्हें हम बचपन से सुनते आ रहे हैं । पर जब इन्हें उस्ताद मेहदी हसन की आवाज़ मिलती है तो यही पाठ नायाब बन जाता है । अशरफ साहब ने इस गाने में गिटार और बांसुरी की वो तान रखी है कि दिल अश अश कर उठता है । तो सुकून के साथ सुनिए सुखनसाज़ की ये पेशक़श ।
अच्छी बात कहो, अच्छी बात सुनो,
अच्छाई करो, ऐसे जियो
चाहे ये दुनिया बुराई करे
तुम ना बुराई करो ।।
दुख जो औरों के लेते हैं
मर के भी जिंदा रहते हैं
आ नहीं सकतीं उसपे बलाएं
लेता है जो सबकी दुआएं
अपने हों या बेगाने हों
सबसे भलाई करो ।। अच्छी बात करो ।।
चीज़ बुरी होती है लड़ाई
होता है अंजाम तबाही
प्यार से तुम सबको अपना लो
दुश्मन को भी दोस्त बना लो
भटके हुए इंसानों की तुम
राहनुमाई करो ।। अच्छी बात करो ।।
सुखनसाज़ पर उस्ताद मेहदी हसन के फिल्मी गीतों और उनके लिए दुआओं का सिलसिला जारी रहेगा ।Posted by Yunus Khan at 8:57 AM 5 comments
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