लगता है नहीं...उस्ताद मेहदी हसन के इंतेक़ाल के बाद सर्वत्र एक दु:खद वीराना पसरा पड़ा है.उस्तादजी के जाने से महज़ एक जिस्म नहीं गया,एक आवाज़ नहीं गई,एक रिवायत,एक अंदाज़ एक डिसिप्लीन और एक तसल्ली ही चली गई. जिस तरह से उन्होंने तमाम ग़ज़लों को बरता है वह अब कभी सुनाई नहीं देगा. अनूप जलोटा से बात हो रही थी तो बोले ज़रा सोचिये तकनीक और तमाशे की इस दुनिया में महज़ एक बाजा और तबला लेकर कोई साठ बरस तक बादशाहत करता रहा;क्या ये किसी करिश्मे से कम है. वाक़ई अनूप भाई ठीक कहते हैं. ये तय है कि बीते दस-बारह बरसों से उस्ताद एकदम निश्क्रिय थे पर न जाने क्यों एक आस सी थी कि हम उन्हें एक बार फिर गाता-मुस्कुराता देखेंगे.
ग़ज़ल को नौटंकी बना देने का कारोबार निर्बाध जारी है लेकिन जब उस्ताद के सुरीले आस्ताने पर आ जाएँ तो लगता है कि वाह ! दुनिया कितनी ख़ूबसूरत और सुरीली है...मुलाहिज़ा फ़रमाएँ आपकी मेरी न जाने कितनी बार सुनी हुई ये ग़ज़ल...गुलों में रंग भरे....सुख़नसाज़ पर पहले जारी हो चुकी पेशकश से अलहदा कुछ और विलम्बत...
आज उस्ताद मेहदी हसन के न होने पर जब वक़्त अपनी बेशर्मी से भाग रहा है...मुलाहिज़ा फ़रमाएँ...ये मध्दिम,मुलायम सी मनभावन कम्पोज़िशन और महसूस करें कि मेहदी हसन का जाना ज़िन्दगी से इत्मीनान का जाना भी है.
Thursday, June 14, 2012
क्या तसल्ली का ऐसा सुर फिर सुनाई देगा ?
Posted by sanjay patel at 7:49 PM 3 comments
Labels: ग़ज़ल, गुलों में रंग भरे, मेहदी हसन
Wednesday, February 22, 2012
दिल की तबाही भूले नहीं हम, देते हैं अब तक उनको दुआएं
अख्तरी बाई यानी बेगम अख्तर किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं. मलिका-ए-गज़ल के नाम से विख्यात बेगम अख्तर ने पुराने उस्तादों को जितना बखूबी गाया उतना ही अपने समकालीनों को. ग़ालिब और मीर जैसे उस्ताद शायर की रचनाओं को उन्होंने स्वर दिया तो शकील बदायूनी और सुदर्शन फाकिर को भी. गज़लों के चयन में उनकी सूझबूझ के अलावा शब्दों के विशिष्ट उच्चारण ने उन्हें सबसे अलग पहचान थी. आज उनकी गाई एक कम विख्यात रचना पेश है. शायर हैं तस्कीन कुरैशी.
अब तो यही हैं दिल से दुआएं
भूलने वाले भूल ही जाएँ
वजह-ए-सितम कुछ हो तो बतायें
एक मोहब्बत लाख ख़तायें
दर्द-ए-मोहब्बत दिल में छुपाया
आँख के आँसू कैसे छुपायें
होश और उनकी दीद का दावा
देखने वाले होश में आयें
दिल की तबाही भूले नहीं हम
देते हैं अब तक उनको दुआएं
रंग-ए-ज़माना देखने वाले
उनकी नज़र भी देखते जायें
शग़ल-ए-मोहब्बत अब है ये 'तस्कीन'
शेर कहें और जी बहलायें
Posted by Ashok Pande at 10:00 AM 2 comments
Tuesday, October 11, 2011
उसके होने से क़ायम थी सुर की आस
ग़ज़ल का सुनने का शौक़ हो और आपने जगजीतसिंह का नाम न सुना हो ऐसा मुमकिन नहीं. इस आवाज़ ने एशिया महाद्वीप में तलत मेहमूद,बेग़म अख़्तर,के.एल.सहगल और मेहंदी हसन के बाद सबसे ज़्यादा मकबूलियत हासिल की. यूँ शुरूआत में वे फ़िल्म संगीत से ख़ासे मुतास्सिर थे लेकिन उनकी रूह में क्लासिकल संगीत हरदम घुमड़ता रहता था. श्रीगंगानगर (राजस्थान) उस्ताद जमाल ख़ान से उन्होंने बाक़ायदा तालीम हासिल की थी.जब मुम्बई पहुँचे तो काम तो एक दम मिल नहीं सकता था जो कई कॉलेजों के रेस्टॉरेंट्स में फ़िल्मी गीत गाकर गुज़ारा किया. इसमें कोई शक नहीं कि जगजीतसिंह के मन में ग़ज़ल को लेकर एक तूफ़ान था और बतौर संगीतकार उनके मन में यह लक्ष्य स्पष्ट था कि रिवायती अंदाज़ से हट कर कुछ नया नहीं किया गया तो रही सही ग़ज़ल भी मर जाएगी. जगजीतसिंह के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने वालों की भी बड़ी तादात है. वजह ये थी कि जगजीत क़ामयाबी की ऐसी कहानी रच चुके थे कि वे अपनी शर्त पर कंसर्ट को चलाते थे. तक़रीबन चार बार उनके लाइव कंसर्ट को एंकर करते हुए मैंने यह महसूस किया था कि वे सुनने वालों के मूड को अपने गणित से भाँपते थे और क्या गाना-क्या नहीं ख़ुद तय करते थे. उन्हें सुनने वालों की नब्ज़ का अंदाज़ अपनी पहली पेशकश से लग जाता था और मंच पर वे हर लम्हा मानसिक रूप से चैतन्य रहते थे. पुत्र विवेक की मृत्यु के बाद तबला वादक अभिनव उपाध्याय और वॉयलिन वादक दीपक पण्डित जैसे युवा कलाकारों के साथ उन्होंने अपनी टीम बनाई और पूरी दुनिया में ग़ज़ल का जादू बिखेरा.
जगजीत सिंह की सबसे बड़ी ताक़त थी अच्छी शायरी की पहचान और करिश्माई और खरज भरा स्वर जो ऐसी प्रतीति देता था मानो ये आवाज़ पाताल से गूँजती हुई हमारे कानों में आ रही है.इस बात का श्रेय भी जगजीतसिंह के माथे जाता है कि इस फ़नक़ार ने चित्रपट संगीत जैसी लोकप्रिय विधा के सामने ग़ज़ल का विराट शामियाना खड़ा किया. अस्सी और नब्बे के साल के बीच जगजीतसिंह के एलबम्स ने रेकॉर्ड तोड़ बिक्री की और किसी किसी बरस फ़िल्मी सीडियों और केसेट्स के सेल को पीछे छोड़ा.बीते तीस बरस का वक़्त ग़ज़ल के उस सुरीलेपन का दौर है जिसकी शिनाख़्त बिला शक जगजीतसिंह की ग़ज़लों से होती है. सुदर्शन फ़ाकिर,निदा फ़ाज़ली जैसे शायरों को जगजीतजी ने ख़ूब गाया और दाद बटोरी. जगजीतसिंह के भीतर गायक के साथ एक उम्दा कम्पोज़र भी हर वक़्त ज़िन्दा रहा.उनके करियर की लोकप्रियता में इस कम्पोज़र का बड़ा हाथ है और बदक़िस्मती से इस बात को कहीं ख़ासतौर पर रेखांकित भी नहीं किया गया है. गुलज़ार के टीवी धारावाहिक ग़ालिब में ज़रूर इस बात को थोड़ा बहुत महसूस किया गया लेकिन बाज़ मौक़ों पर वह कम्पोज़र जगजीत गुमनाम ही रहे.
बहरहाल जगजीतसिंह का जाना ग़ज़ल के ख़ामोशी से आँसू बहाने का दिन है. इन आँसुओं मे न केवल अपने मुहबूब गुलूकार के लिये मुहब्बत का इज़हार है बल्कि यह घबराहट भी शामिल है कि क्या जगजीतसिंह के बाद बेसुरापन अपने पाँव जमाने में क़ामयाब हो जाएगा.जगजीतसिंह आपके होने से सुर की आस जो बनी रहती थी.
Posted by sanjay patel at 9:41 AM 4 comments
Monday, April 18, 2011
मेरे चारागर को नवेद हो, सफ़-ए-दुश्मना को खबर करो
उर्दू के शीर्षस्थ शायरों में शुमार होता है फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का. आज सुनिए इक़बाल बानो से उनकी यह मास्टरपीस ग़ज़ल:
न गंवाओ नावक-ए-नीमकश, दिल-ए-रेज़ा रेज़ा गंवा दिया
जो बचे हैं संग समेट लो, तन-ए-दाग़-दाग़ लुटा दिया
मेरे चारागर को नवेद हो, सफ़-ए-दुश्मना को खबर करो
जो वो क़र्ज़ रखते थे जान पर, वो हिसाब आज चुका दिया
जो रुके तो कोह-ए-गरां थे हम, जो चले तो जां से गुज़र गए
रह-ए-यार हम ने क़दम क़दम, तुझे यादगार बना दिया
Posted by Ashok Pande at 9:00 AM 3 comments
Labels: इक़बाल बानो, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
Thursday, April 14, 2011
इक न इक ज़ुल्मत से जब बाबस्ता रहना है तो 'जोश'
जोश मलीहाबादी साहब की प्रख्यात ग़ज़ल एक बार पुनः उस्ताद मेहदी हसन की आवाज़ में -
फ़िक्र ही ठहरी तो दिल को फ़िक्र-ए-खूबां क्यूँ न हों
ख़ाक होना है तो ख़ाक-ए-कू-ए-जाना क्यूँ न हों
जीस्त है जब मुस्तकिल आवारागर्दी ही का नाम,
अक्ल वालों फिर तवाफ़-ए-कू-ए-जाना क्यूँ न हों
इक न इक रीफत के आगे सजदा लाजिम है तो फिर
आदमी महव-ए-सजूद-ए-सिर-ए-खूबां क्यूँ न हों
इक न इक ज़ुल्मत से जब बाबस्ता रहना है तो 'जोश'
जिन्दगी पर साया-ए-जुल्फ-ए-परीशां क्यूँ न हों
Posted by Ashok Pande at 9:00 AM 2 comments
Labels: जोश मलीहाबादी, मेहदी हसन
Monday, April 11, 2011
इक उम्र का रोना है दो दिन की शनासाई
उस्ताद मेहदी हसन ख़ान साहेब से सुनिये शहज़ाद अहमद का कलाम
जल भी चुके परवाने हो भी चुकी रुसवाई
अब ख़ाक उड़ाने को बैठे हैं तमाशाई
तारों की ज़िया दिल में एक आग लगाते हैं
आराम से रातों को सोते नहीं सौदाई
रातों की उदासी में ख़ामोश है दिल मेरा
बेहिस हैं तमन्नाएं नींद आये के मौत आई
अब दिल को किसी करवट आराम नहीं मिलता
इक उम्र का रोना है दो दिन की शनासाई
Posted by Ashok Pande at 3:06 PM 2 comments
Labels: मेहदी हसन, शहज़ाद अहमद
Thursday, March 31, 2011
वो ही एक ख़ामोश नग़मा है शकील जान-ए-हस्ती
शकील बदायूंनी साहेब का क्या परिचय दिया जाए. फ़िलहाल उनकी एक शानदार ग़ज़ल तलत महमूद की रेशम आवाज़ में -
ग़म-ए-आशिकी से कह दो रह-ए-आम तक न पहुंचे
मुझे ख़ौफ़ है ये तोहमत मेरे नाम तक न पहुंचे
मैं नज़र पी रहा था तो ये दिल ने बददुआ दी
तेरा हाथ ज़िन्दगी भर कभी जाम तक न पहुंचे
ये अदा-ए-बेनियाज़ी तुझे बेवफ़ा मुबारक
मग़र ऐसी बेरुख़ी क्या कि सलाम तक न पहुंचे
वो ही एक ख़ामोश नग़मा है शकील जान-ए-हस्ती
जो ज़ुबान तक न आए जो कलाम तक न पहुंचे
Posted by Ashok Pande at 11:45 AM 3 comments
Labels: तलत महमूद, शकील बदायूंनी
Tuesday, March 29, 2011
कुछ न दवा ने काम किया
उर्दू शायरों की सूची में व्यक्तिगत रूप से मीर तक़ी मीर मेरे लिए सबसे ऊपर आए हैं. इस ख़ुदा-ए-सुख़न का ये जाना-पहचाना कलाम इस सोए हुए ब्लॉग को जगाने का काम करे, इस दुआ और इतने लम्बे समय तक यहां किसी नई पोस्ट न लगा पाने के लिए माफ़ी के साथ मलिका-ए-ग़ज़ल बेग़म अख़्तर की आवाज़ में
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
अहद-ए-जवानी रो रो काटा पीरी में लीं आँखें मूँद
यानी रात बहुत थे जागे सुबह हुई आराम किया
याँ के सुफ़ेद-ओ-स्याह में हमको दख़्ल जो है सो इतना है
रात को रो-रो सुबहो किया और सुबहो को ज्यों त्यों शाम किया
'मीर' के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उनने तो
कश्क़ा खेंचा दैर में बैठा कब का तर्क़ इस्लाम किया
(अहद-ए-जवानी- युवावस्था, पीरी- बुढ़ापा, कश्क़ा- तिलक, तर्क़ इस्लाम किया- इस्लाम को छोड़ दिया)
Posted by Ashok Pande at 1:32 PM 3 comments
Labels: बेग़म अख़्तर, मीर तक़ी मीर
Thursday, August 12, 2010
दिल भी यारब कई दिये होते
कुंदन स्वर से पगी के.एल.सहगल की आवाज़ एशिया महाव्दीप का वह पावन स्वर है जिसका आसरा लेकर ग़ज़ल फली-फूली. सहगल साहब ने जिन हालात में अपनी गायकी को पाला-पोसा वह कहानी अपने आप में किसी जासूसी उपन्यास से कम रोमांचक नहीं. बिना किसी तालीम के सहगल साहब स्वर की यायावरी करते रहे और संगीत का अलख जगाते रहे. उत्तर भारत में उर्दू घर-घर की ज़ुबान रही है बल्कि स्कूलों में प्राथमिक शालाओं और घर पर आने वाले मौलवी साहबों से मिली दीक्षाओं का दामन थामकर उर्दू को विस्तार मिला. कई कूपमण्डूक कहते हैं कि भाई हिन्दी और उर्दू अलग भाषाएं हैं लेकिन ये नासमझ नहीं जानते कि अमीर ख़ुसरो के दौर से इस देश की गंगा-जमनी तहज़ीब को हिन्दी बाद में और हिन्दवी पहले मिली है जिसमें ज़ुबान का शीरींपन दस्तयाब रहा है.
जनश्रुति है कि सहगल साहब आफ़ताब ए मौसीक़ी उस्ताद फ़ैयाज़ ख़ाँ के शागिर्द थे लेकिन इन्दौर में रहने वाले एक वरिष्ठ संगीत संकलनकर्ता और शोधार्थी श्री जयंत डांगे का कहना है कि जगह जगह यह पूछा जाता था कि सहगल साहब आपने किससे सीखा या आपका ताल्लुक किस घराने से है तो इस बात से झुंझलाकर एक बार सहगल साहब ने उस्ताद फ़ैयाज़ ख़ाँ साहब से गंडा बंधवा लिया था. ख़ैर महान कलाकारों के हज़ारों मुरीद और करोड़ों क़िस्से..इन बातों से सहगल साहब और उनकी शहद भीगी गायकी उनके लिये हमारी दीवानगी का क्या लेना-देना.
बहरहाल हम सहगल साहब की बात कर रहे थे . वे जलंधर,शिमला,दिल्ली,कोलकाता से मुम्बई पहुँचे और गायकी का झण्डा करोड़ों संगीतप्रेमियों के दिलों में गाड़ दिया. सहगल साहब की गायकी का सफ़र सिर्फ़ फ़िल्मी रचनाओं तक महदूद नहीं है उसमें कुछ अनमोल बांग्ला रचनाएं और ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लें भी समाहित हैं. बहुत दिन हुए सुखनसाज़ पर आए हुए..सोचा इस अबोले को तोड़ने के लिये सहगल साहब से बेहतर आवाज़ और क्या हो सकती है. हाँ यह कहना चाहूँगा कि मुझ जैसे अनंत संगीतप्रेमियों को ग़ज़ल की लज़्ज़त चखवाने का काम सबसे पहले के.एल.सहगल ने किया...बेग़म अख़्तर,तलत महमूद और मेहंदी हसन ने उसे और मीठा बनाया. पेश ए ख़िदमत है ग़ालिब का कलाम !
Posted by sanjay patel at 7:00 AM 3 comments
Labels: उर्दू, के.एल.सहगल, ग़ज़ल, ग़ालिब., ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लें
Friday, November 27, 2009
उनकी गायकी रूहानी तसल्ली का पता देती है.
ग़ज़ल के जो मुरीद रूहानी तसल्ली तलाशते हैं; उस्ताद मेहंदी हसन उनके लिये एक तीर्थ हैं.ख़ाँ साहब इस बात को शिद्दत से महसूस करते हैं कि क्लासिकल मूसीक़ी के आसरे के बग़ैर ग़ज़ल का इंतेख़ाब करना बेमानी है. उनके शब्दों की सफ़ाई में जो स्पष्टता सुनाई देती है उसकी ख़ास वजह वही तसल्ली है जिसके शैदाई हैं उस्तादजी. यूँ ऐसे कई गूलूकार सुने हैं जो उस्तादजी की ग़ज़लें गाते हैं लेकिन वह मसखरी ही लगती है. जितना ख़ाँ साहब को सुना और उनकी गायकी को समझा है ..तो जाना है कि यदि आप शायरी और संगीत के पार जाकर किसी रूहानी आस्ताने की तलाश में हैं तो मेहंदी हसन अल्टीमेट नाम है.
मैं ये भी कहना चाहूँगा कि मेहंदी हसन जिस तरह से शायरी को गायकी में ट्रांसलेट करते हैं या बरतते हैं वह बेजोड़ है. उन्होंने अपनी गायकी में फ़िज़ूल के गिमिक नहीं किये हैं और सबसे बड़ी बात यह कि वे ख़ुद अपनी गायकी का मज़ा लेते हैं. ये मज़ा गले से उठने वाली उन हरक़तों या तानों को लेकर होता है जिसे ग़ज़ल शुरू करने के पहले ख़ाँ साहब भी ख़ुद भी बाख़बर नहीं होते. गले इन सुरों को कौन मदू (आमंत्रित) करता है ...अल्लाह जाने...
मेहंदी हसन की गायकी भी तो उसी ऊपरवाले के करिश्मों का पता हैं न ?
Posted by sanjay patel at 8:38 AM 6 comments
Labels: उर्दू, क्लासिकल मूसीक़ी, ग़ज़ल, गायकी, जिगर, तेरी ख़ुशी से अगर