Tuesday, September 11, 2012

रात गयी तो रात ना होगी

खालिद महमूद ‘आरिफ़’ की ग़ज़ल उस्ताद मेहदी हसन की आवाज़ में -



बिन बारिश बरसात ना होगी
रात गयी तो रात ना होगी

राज़-ए-मोहब्बत तुम मत पूछो
मुझसे तो ये बात ना होगी

किस से दिल बहलाओगे तुम
जिस दम मेरी ज़ात ना होगी

यूं देखेंगे ‘आरिफ़’ उसको
बीच में अपनी ज़ात ना होगी




Monday, September 10, 2012

सोने वालों की तरह जागने वालों जैसी

एक बार फिर उस्ताद मेहदी हसन. ग़ज़ल अहमद फ़राज़ की - 







 ज़ुल्फ़ रातों सी है, रंगत है उजालों जैसी
पर तबीयत है वो ही भूलने वालों जैसी

ढूँढता फिरता हूँ लोगों में शबाहत उसकी
के वो ख्वाबों में लगती है ख़यालों जैसी

उसकी बातें भी दिल-आवेज़ हैं सूरत की तरह
मेरी सोचें भी परीशां मेरे बालों की तरह

उसकी आखों को कभी गौर से देखा है 'फ़राज़'
सोने वालों की तरह जागने वालों जैसी

Sunday, September 9, 2012

तू आ जा रसिया नदिया किनारे मोरा गाँव


पिछला लम्बा अरसा अनेक लगातार लगातार मरहूम उस्ताद मेहदी हसन खान साहब को सुनने में बीता. आज आपको सुनवाता हूँ उनकी एक दुर्लभ कम्पोज़ीशन - तू आ जा रसिया नदिया किनारे मोरा गाँव

 

Saturday, September 8, 2012

हम निगाहों से तेरी आरती उतारेंगे - उस्ताद मेहदी हसन



यह विख्यात गीत कई गायकों ने गाया है. कोई चार साल पहले मैंने यही गीत आसिफ़ अली की आवाज़ में कबाड़ख़ाने में लगाया था. आज वही उस्ताद मेहदी हसन खां साहब की आवाज़ में -





अब के साल पूनम में, जब तू आएगी मिलने
हम ने सोच रखा है रात यूं गुज़ारेंगे
धड़कनें बिछा देंगे शोख़ तेरे क़दमों पे
हम निगाहों से तेरी आरती उतारेंगे

तू कि आज क़ातिल है, फिर भी राहत-ए-दिल है
ज़हर की नदी है तू, फिर भी क़ीमती है तू
पस्त हौसले वाले तेरा साथ क्या देंगे
ज़िंदगी इधर आ जा, हम तुझे गुज़ारेंगे

आहनी कलेजे को, ज़ख़्म की ज़रूरत है
उंगलियों से जो टपके, उस लहू की हाज़त है
आप ज़ुल्फ़-ए-जानां के, ख़म संवारिये साहब
ज़िंदगी की ज़ुल्फ़ों को आप क्या संवारेंगे

हम तो वक़्त हैं पल हैं, तेज़ गाम घड़ियां हैं
बेकरार लमहे हैं, बेथकान सदियां हैं
कोई साथ में अपने, आए या नहीं आए
जो मिलेगा रस्ते में हम उसे पुकारेंगे

Friday, September 7, 2012

खबर क्या थी छुपी है मेरे दामन में भी चिंगारी ...


१९७३ में पकिस्तान में एक फिल्म आई थी – ‘दामन और चिंगारी’. मंज़ूर अशरफ़ के संगीत निर्देशन में एक बार फिर मेहदी हसन साहब ने मंसूर अनवर के गीत को आवाज़ बख्शी थी.

वही गीत सुनिए एक महफ़िल में दूसरे ही अंदाज़ में -



हमारे दिल से मत खेलो, खिलौना टूट जाएगा
ज़रा सी ठेस पहुंचेगी ये शीशा टूट जाएगा

यहाँ के लोग तो दो गाम चल के छोड़ देते हैं
ज़रा सी देर में बरसों के रिश्ते तोड़ देते हैं
खबर क्या थी कि किस्मत का सितारा डूब जाएगा

जो मिलते हैं बज़ाहिर दोस्त बनकर राज़दां बनकर
छुपे रहते हैं उनकी आस्तीनों में कई खंज़र
खुलेगी आँख तो सपना सुहाना टूट जाएगा

खबर क्या थी छुपी है मेरे दामन में भी चिंगारी
लगेगी आग गुलशन में जलेगी सारी फुलवारी
गिरेंगी बिजलियाँ इतनी नज़ारा टूट जाएगा.

Thursday, September 6, 2012

रोशन उसी के दम से था बुझता हुआ दिया


१९७० में पाकिस्तान में रिलीज़ हुई फिल्म ‘अनजान’ में मंज़ूर अशरफ़ के संगीत निर्देशन में उस्ताद मेहदी हसन ने मसरूर अनवर का लिखा एक गीत गाया था.

यहाँ एक महफ़िल में उस्ताद इस गीत को किस क्लासिकल अंदाज़ में पेश कर रहे हैं, गौर फरमाइए –




अपनों ने ग़म दिया तो मुझे याद आ गया
एक अजनबी जो गैर था और ग़मगुसार था

वो साथ थ तो दुनिया के ग़म दिल से दूर थे
खुशियों को साथ ले के न जाने कहाँ गया

दुनिया समझ रही है जुदा मुझ से हो गया
नज़रों से दूर जा के भी दिल से न जा सका

अब ज़िंदगी की कोई तमन्ना नहीं मुझे
रोशन उसी के दम से था बुझता हुआ दिया

Wednesday, September 5, 2012

दिल भी कम दुखता है वो याद भी कम आते हैं


मरहूम उस्ताद मेहदी हसन खान साहेब की आवाज़ में एक अपेक्षाकृत कम सुनी गयी महाकवि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की एक ग़ज़ल पेश है. सुख़नसाज़ के चाहनेवालों के लिए जल्दी ही उस्ताद की कुछेक और ऐसी ही कम्पोज़ीशंस पेश करता हूँ.



दिल में अब यूँ तेरे भूले हुये ग़म आते हैं
जैसे बिछड़े हुये काबे में सनम आते हैं

रक़्स-ए-मय तेज़ करो, साज़ की लय तेज़ करो
सू-ए-मैख़ाना सफ़ीरान-ए-हरम आते हैं 
 
और कुछ देर न गुज़रे शब-ए-फ़ुर्क़त से कहो
दिल भी कम दुखता है वो याद भी कम आते हैं

इक इक कर के हुये जाते हैं तारे रौशन
मेरी मन्ज़िल की तरफ़ तेरे क़दम आते हैं

कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने का दिमाग
वो तो जब आते हैं माइल-ब-करम आते हैं

Thursday, June 14, 2012

क्या तसल्ली का ऐसा सुर फिर सुनाई देगा ?

लगता है नहीं...उस्ताद मेहदी हसन के इंतेक़ाल के बाद सर्वत्र एक दु:खद वीराना पसरा पड़ा है.उस्तादजी के जाने से महज़ एक जिस्म नहीं गया,एक आवाज़ नहीं गई,एक रिवायत,एक अंदाज़ एक डिसिप्लीन और एक तसल्ली ही चली गई. जिस तरह से उन्होंने तमाम ग़ज़लों को बरता है वह अब कभी सुनाई नहीं देगा. अनूप जलोटा से बात हो रही थी तो बोले ज़रा सोचिये तकनीक और तमाशे की इस दुनिया में महज़ एक बाजा और तबला लेकर कोई साठ बरस तक बादशाहत करता रहा;क्या ये किसी करिश्मे से कम है. वाक़ई अनूप भाई ठीक कहते हैं. ये तय है कि बीते दस-बारह बरसों से उस्ताद एकदम निश्क्रिय थे पर न जाने क्यों एक आस सी थी कि हम उन्हें एक बार फिर गाता-मुस्कुराता देखेंगे.
ग़ज़ल को नौटंकी बना देने का कारोबार निर्बाध जारी है लेकिन जब उस्ताद के सुरीले आस्ताने पर आ जाएँ तो लगता है कि वाह ! दुनिया कितनी ख़ूबसूरत और सुरीली है...मुलाहिज़ा फ़रमाएँ आपकी मेरी न जाने कितनी बार सुनी हुई ये ग़ज़ल...गुलों में रंग भरे....सुख़नसाज़ पर पहले जारी हो चुकी पेशकश से अलहदा कुछ और विलम्बत...
आज उस्ताद मेहदी हसन के न होने पर जब वक़्त अपनी बेशर्मी से भाग रहा है...मुलाहिज़ा फ़रमाएँ...ये मध्दिम,मुलायम सी मनभावन कम्पोज़िशन और महसूस करें कि मेहदी हसन का जाना ज़िन्दगी से इत्मीनान का जाना भी है.


Wednesday, February 22, 2012

दिल की तबाही भूले नहीं हम, देते हैं अब तक उनको दुआएं


अख्तरी बाई यानी बेगम अख्तर किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं. मलिका-ए-गज़ल के नाम से विख्यात बेगम अख्तर ने पुराने उस्तादों को जितना बखूबी गाया उतना ही अपने समकालीनों को. ग़ालिब और मीर जैसे उस्ताद शायर की रचनाओं को उन्होंने स्वर दिया तो शकील बदायूनी और सुदर्शन फाकिर को भी. गज़लों के चयन में उनकी सूझबूझ के अलावा शब्दों के विशिष्ट उच्चारण ने उन्हें सबसे अलग पहचान थी. आज उनकी गाई एक कम विख्यात रचना पेश है. शायर हैं तस्कीन कुरैशी.




अब तो यही हैं दिल से दुआएं
भूलने वाले भूल ही जाएँ

वजह-ए-सितम कुछ हो तो बतायें
एक मोहब्बत लाख ख़तायें

दर्द-ए-मोहब्बत दिल में छुपाया
आँख के आँसू कैसे छुपायें

होश और उनकी दीद का दावा
देखने वाले होश में आयें

दिल की तबाही भूले नहीं हम
देते हैं अब तक उनको दुआएं

रंग-ए-ज़माना देखने वाले
उनकी नज़र भी देखते जायें

शग़ल-ए-मोहब्बत अब है ये 'तस्कीन'
शेर कहें और जी बहलायें

Tuesday, October 11, 2011

उसके होने से क़ायम थी सुर की आस



ग़ज़ल का सुनने का शौक़ हो और आपने जगजीतसिंह का नाम न सुना हो ऐसा मुमकिन नहीं. इस आवाज़ ने एशिया महाद्वीप में तलत मेहमूद,बेग़म अख़्तर,के.एल.सहगल और मेहंदी हसन के बाद सबसे ज़्यादा मकबूलियत हासिल की. यूँ शुरूआत में वे फ़िल्म संगीत से ख़ासे मुतास्सिर थे लेकिन उनकी रूह में क्लासिकल संगीत हरदम घुमड़ता रहता था. श्रीगंगानगर (राजस्थान) उस्ताद जमाल ख़ान से उन्होंने बाक़ायदा तालीम हासिल की थी.जब मुम्बई पहुँचे तो काम तो एक दम मिल नहीं सकता था जो कई कॉलेजों के रेस्टॉरेंट्स में फ़िल्मी गीत गाकर गुज़ारा किया. इसमें कोई शक नहीं कि जगजीतसिंह के मन में ग़ज़ल को लेकर एक तूफ़ान था और बतौर संगीतकार उनके मन में यह लक्ष्य स्पष्ट था कि रिवायती अंदाज़ से हट कर कुछ नया नहीं किया गया तो रही सही ग़ज़ल भी मर जाएगी. जगजीतसिंह के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने वालों की भी बड़ी तादात है. वजह ये थी कि जगजीत क़ामयाबी की ऐसी कहानी रच चुके थे कि वे अपनी शर्त पर कंसर्ट को चलाते थे. तक़रीबन चार बार उनके लाइव कंसर्ट को एंकर करते हुए मैंने यह महसूस किया था कि वे सुनने वालों के मूड को अपने गणित से भाँपते थे और क्या गाना-क्या नहीं ख़ुद तय करते थे. उन्हें सुनने वालों की नब्ज़ का अंदाज़ अपनी पहली पेशकश से लग जाता था और मंच पर वे हर लम्हा मानसिक रूप से चैतन्य रहते थे. पुत्र विवेक की मृत्यु के बाद तबला वादक अभिनव उपाध्याय और वॉयलिन वादक दीपक पण्डित जैसे युवा कलाकारों के साथ उन्होंने अपनी टीम बनाई और पूरी दुनिया में ग़ज़ल का जादू बिखेरा.

जगजीत सिंह की सबसे बड़ी ताक़त थी अच्छी शायरी की पहचान और करिश्माई और खरज भरा स्वर जो ऐसी प्रतीति देता था मानो ये आवाज़ पाताल से गूँजती हुई हमारे कानों में आ रही है.इस बात का श्रेय भी जगजीतसिंह के माथे जाता है कि इस फ़नक़ार ने चित्रपट संगीत जैसी लोकप्रिय विधा के सामने ग़ज़ल का विराट शामियाना खड़ा किया. अस्सी और नब्बे के साल के बीच जगजीतसिंह के एलबम्स ने रेकॉर्ड तोड़ बिक्री की और किसी किसी बरस फ़िल्मी सीडियों और केसेट्स के सेल को पीछे छोड़ा.बीते तीस बरस का वक़्त ग़ज़ल के उस सुरीलेपन का दौर है जिसकी शिनाख़्त बिला शक जगजीतसिंह की ग़ज़लों से होती है. सुदर्शन फ़ाकिर,निदा फ़ाज़ली जैसे शायरों को जगजीतजी ने ख़ूब गाया और दाद बटोरी. जगजीतसिंह के भीतर गायक के साथ एक उम्दा कम्पोज़र भी हर वक़्त ज़िन्दा रहा.उनके करियर की लोकप्रियता में इस कम्पोज़र का बड़ा हाथ है और बदक़िस्मती से इस बात को कहीं ख़ासतौर पर रेखांकित भी नहीं किया गया है. गुलज़ार के टीवी धारावाहिक ग़ालिब में ज़रूर इस बात को थोड़ा बहुत महसूस किया गया लेकिन बाज़ मौक़ों पर वह कम्पोज़र जगजीत गुमनाम ही रहे.
बहरहाल जगजीतसिंह का जाना ग़ज़ल के ख़ामोशी से आँसू बहाने का दिन है. इन आँसुओं मे न केवल अपने मुहबूब गुलूकार के लिये मुहब्बत का इज़हार है बल्कि यह घबराहट भी शामिल है कि क्या जगजीतसिंह के बाद बेसुरापन अपने पाँव जमाने में क़ामयाब हो जाएगा.जगजीतसिंह आपके होने से सुर की आस जो बनी रहती थी.