टाइम्स म्युज़िक हमेशा श्रोताओं के लिए कुछ नयापन लेता आया है। हाल ही में उसने जाने-माने युवा ग़ज़ल गायक मो. वक़ील की आवाज़ में गुज़ारिश नाम से एक बड़ा प्यारा एलबम जारी किया है। नई आवाज़ों को सुनने में हम संगीतप्रेमी थोड़े आलसी ही रहे हैं तो इस आदत को भाँपते हुए टाइम्स म्युज़िक ने एक बड़ी सुरीली पहल की है। इसके तहत गुज़ारिश एलबम में मो. वक़ील ने उन ग़ज़लों को गाया है जिनको हम पिछले 40-45 बरसों में निरंतर सुनते आए हैं। कभी रेडियो पर, कभी लाइव या कभी अपने प्रायवेट म्युज़िक कलेक्शन के ज़रिये। गुज़ारिश में शुमार आवाज़े भी उन महबूब गुलूकारों की हैं जो हम सबके दिल के बहुत क़रीब रहे हैं यानी बेग़म अख़्तर, मेहॅंदी हसन, फ़रीदा ख़ानम, लता मंगेशकर, ग़ुलाम अली, जगजीत सिंह और अहमद हुसैन-मो. हुसैन।
मो. वक़ील एक ऐसी उभरती हुई आवाज़ हैं जिनकी कहन में पुराने और नये अंदाज़ का कलेवर दमकता दिखाई देता है। इसकी दो वजह है; एक तो उनकी पैदाइश सन् 1976 की है और दूसरा उनकी तालीम उस्ताद अहमद हुसैन और मो. हुसैन के सान्निध्य में हुई है जो ग़ज़ल गायकी के ऐसे नुमाइंदे हैं जिन्होंने पारंपरिक गायन का दामन कभी नहीं छोड़ा है। यही वजह है कि मो. वक़ील की आवाज़ में एक रूहानी फ़िरत है। इस एलबम में वे अज़ीम फ़नकारों को दोहराते ज़रूर हैं लेकिन उन्होंने अपना मौलिक अंदाज़ भी बरक़रार रखा है। वक़ील भाई की आवाज़ में एक सुरीला घुमाव है जो उन्हें नई आवाज़ों की भीड़ में एक अलग पहचान देता है.हाँ ये भी बता दूँ कि किसी बात को अपनी तरह से कहने की उपज भी मो.वक़ील में भी बड़ी लाजवाब रही है.
टी.वी.एस. सारेगामा फ़ायनल (1997) और टी.वी.एस. सारेगामा मेगा फ़ायनल (1998) के विजेता के रूप में मो. वक़ील संगीत परिदृश्य पर उभरकर आए और उसके बाद वे लगातार अपनी मंज़िल की ओर अग्रसर हैं। सन् 2006 उनके लिए बड़ा मक़बूल रहा जब उन्हें वीर-ज़ारा में स्व. मदन मोहन की कम्पोज़िशन को गाने का अवसर मिला।
गुज़ारिश का कायाकल्प जानी-मानी कंपोज़र मंजू नारायण ने किया है। उन्होंने मूल कंपोज़ीशन्स की रूह को क़ायम रखा है और मो. वक़ील की आवाज़ में उभरकर आने वाले तत्वों को और बेहतर बनाने की कोशिश की है। उम्मीद है कि गुज़ारिश आपको सुकून देगी।
मो.वक़ील के इस नए एलबम में पहली रचना उस्ताद मेहंदी हसन साहब के प्रति एक आदरांजलि है.ग़ज़ल आप-हम की जानी पहचानी और गुनगुनाई हुई...रंजिश ही रही दिल ही दुखाने के लिये आ...मुलाहिज़ा फ़रमाएँ.
Monday, June 22, 2009
गुज़ारिश : एक नई आवाज़ में रंजिश ही सही !
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Wednesday, June 17, 2009
मरने की दुआएँ क्यों माँगू;जीने की तमन्ना कौन करे
वली मोहम्मद सुख़नसाज़ के मुरीदों के लिये अनजाना नाम नहीं है.
उन्हें सुनें तो लगता है जैसे सहरा में एक बाबा बाजा लेकर बैठ गए हैं और
कन्दील की मध्दिम रोशनी में आपको मनचाही बंदिशें सुना रहे हैं.
सनद रहे वली मोहम्मद जैसे गुलूकार तब परिदृश्य पर आए थे जब ज़माने
की गति ऐसी तूफ़ानी और बेपरवाह नहीं थी. सुक़ून और तसल्ली के दौर
के गायक रहे हैं वली मोहम्मद. उम्दा क़लाम को चुनना, गुनना और फ़िर गाना
उस दौर की ख़ासियत थी. मेरा प्यारा वतन मालवा इन दिनों ख़ासा उमस
भरा है;ऐसे में ऐसी रचना सुनना एक अलग रूहानी अहसास देता है.
मुलाहिज़ा फ़रमाएँ बाबा वली मोहम्मद की ये बेशक़ीमती रचना.
Posted by sanjay patel at 10:59 PM 7 comments
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Wednesday, June 3, 2009
ख़ुशबू तुम्हारी ज़ुल्फ़ की फूलों से कम नहीं !
ग़ज़ल के जगमगाते कलश कंठ से जब कोई रचना झर रही हो तो लगता है जीवन के बाक़ी सुखों की तलाश बेमानी है. छोटी से रचना है उस्ताद मेहंदी हसन साहब की गाई हुई लेकिन इतने में भी वे बता देते हैं कि वे किस बलन के फ़नकार हैं.आलाप से ही जाँच लीजिये कि क्या तसल्ली है किसी बंदिश को डिज़ाइन करने की. उस्तादजी के बारे में सारी प्रशंसाएँ छोटी पड़ जाएं तो लगता है उनके हाथ का बाजा (हारमोनियम) ही सुन लीजै. हाय ! क्या रवानी है रीड्स पर . कितने हैं जो ख़ुद गाते हुए इस सहजता से बाजा बजाते जाते हैं.उस्ताद के बारे में यह कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा कि वे बित्ती सी रचना को करिश्मा बनाने का हुनर रखते हैं.अब इस रचना का क्राफ़्ट ही देख लीजियेगा...बड़ा सादा है लेकिन मेहंदी हसन हैं जनाब कि शायर के दामन के लिये दाद बटोर लेते हैं.
हाँ एक ख़ास बात बताता चलूँ ? भारतरत्न लता मंगेशकर तनहाई में जिस एकमात्र गायक की रचनाएँ सुनना पसंद करती हैं उसका नाम मेहंदी हसन है.
Posted by sanjay patel at 7:29 PM 7 comments
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Tuesday, May 26, 2009
जब भी आती है तेरी याद कभी शाम के बाद
उर्दू के शायर कृष्ण 'अदीब' साहब का जन्म जालंधर ज़िले में २१ नवम्बर १९२५ को हुआ था. पन्द्रह साल की आयु में घर छोड़ने पर विवश हुए - कुलीगिरी की, फ़ैक्ट्री में मज़दूर रहे.अपने जीवन का ज़्यादातर समय उन्होंने लुधियाना में बिताया. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में वरिष्ठ फ़ोटोग्राफ़र के तौर पर काम करने के बाद वे १९८५ में रिटायर हुए. लम्बी बीमारी और आर्थिक कमी के चलते ७ जुलाई १९९५ को उनकी मृत्यु हुई. 'अदीब' साहब की मुख्य किताबों में 'आवाज़ की परछाइयां', 'फूल, पत्ते और ख़ुशबू' और 'रौ में है रख्शे उम्र' प्रमुख हैं.
आज उनकी जो ग़ज़ल आप सुनने जा रहे हैं, उसे जगजीत सिंह ने भी गाया और भारत भर में लोकप्रिय बनाया. मैं आपको यही ग़ज़ल बाबा मेहदी हसन ख़ान साहेब की आवाज़ में सुनाता हूं. इस प्रस्तुति में खान साहेब ने वे शेर भी गाए हैं जिन्हें जगजीत सिंह ने नहीं गाया था.
जब भी आती है तेरी याद कभी शाम के बाद
और बढ़ जाती है अफसुर्दा-दिली शाम के बाद
अब इरादों पे भरोसा है ना तौबा पे यकीं
मुझ को ले जाये कहाँ तश्ना-लबी शाम के बाद
यूँ तो हर लम्हा तेरी याद का बोझल गुज़रा
दिल को महसूस हुई तेरी कमी शाम के बाद
मैं घोल रंगत-ए-रोशन करता हूं बयाबानी
वरना डस जाएगी ये तीरा-शबी शाम के बाद
दिल धड़कने की सदा थी कि तेरे कदमों की
किसकी आवाज़ सर-ए-जाम शाम के बाद
यूँ तो कुछ शाम से पहले भी उदासी थी 'अदीब'
अब तो कुछ और बढ़ी दिल की लगी शाम के बाद
डाउनलोड यहां से करें:
जब भी आती है तेरी याद कभी शाम के बाद
अदीब साहब की एक ग़ज़ल यहां भी सुनें: तल्ख़ि-ए-मै में ज़रा तल्ख़ि-ए-दिल भी घोलें
Posted by Ashok Pande at 5:46 PM 8 comments
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Sunday, March 29, 2009
'ख़ातिर' ये है बाज़ी-ए-दिल, इसमें जीत से मात भली
'ख़ातिर' ग़ज़नवी (1925 - 2008) बड़े शायरों में गिने जाते हैं. एक शायर होने अलावा वे शोधार्थी, कॉलमनिस्ट, शिक्षाविद भी थे. 'ख़ातिर' ग़ज़नवी प्रोग्रेसिव राइटर्स असोसियेशन इन पाकिस्तान के उपाध्यक्ष भी रहे.
पचास से भी ऊपर किताबें लिख चुके 'ख़ातिर' ग़ज़नवी ने ऑल इन्डिया रेडियो और बाद में रेडियो पाकिस्तान में बतौर प्रोड्यूसर भी बहुत नाम कमाया. ख़ातिर साहब का असली नाम इब्राहीम था और वे चीनी, अंग्रेज़ी, उर्दू और मलय भाषाओं के गहरे जानकार माने जाते थे. यह बात अलहदा है कि उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति बतौर शायर ही मिली.
भारत में ग़ज़ल सुनने-सुनाने वालों को ग़ुलाम अली की गाई उनकी "कैसी चली है अब के हवा तेरे शहर में, बन्दे भी हो गए हैं ख़ुदा तेरे शहर में" अच्छे से याद होगी.
गज़ल के बादशाह ख़ान साहेब मेहदी हसन सुना रहे हैं उन्हीं की एक छोटी बहर की गज़ल. उस्ताद बेतरह बीमार हैं और ग़ुरबत में भी. हम सिर्फ़ उनकी कुशल की कामना भर कर सकते हैं. आज भाई संजय पटेल ने उस्ताद की एक रचना सुरपेटी पर लगाई है. जाना न भूलें.
जब उस ज़ुल्फ़ की बात चली
ढलते ढलते रात ढली
उन आंखों ने लूट के भी
अपने ऊपर बात न ली
शम्अ का अन्जाम न पूछ
परवानों के साथ जली
अब भी वो दूर रहे
अब के भी बरसात चली
'ख़ातिर' ये है बाज़ी-ए-दिल
इसमें जीत से मात भली
*डाउनलोड यहां से करें: जब उस ज़ुल्फ़ की बात चली है
Posted by Ashok Pande at 4:30 PM 3 comments
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Friday, March 27, 2009
जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना
ख़ान साहेब मेहदी हसन ने अपना शागिर्द-ए-अव्वल माना था परवेज़ मेहदी को.
अगस्त २००५ को इस गायक का इन्तकाल हो गया फ़कत अठ्ठावन की उम्र में. उनके वालिद जनाब बशीर हुसैन ख़ुद एक अच्छे क्लासिकल वोकलिस्ट थे और बचपन से ही उन्होंने परवेज़ को संगीत सिखाया. बाद में लम्बे अर्से तक मेहदी हसन साहेब की शागिर्दी में उन्होंने ग़ज़ल गायन की बारीकियां सीखीं. परवेज़ मेहदी नाम भी मेहदी हसन ख़ान साहेब का दिया हुआ था. इन का असली नाम परवेज़ अख़्तर था. उस्ताद अहमद क़ुरैशी से इन्होंने सितार की भी तालीम ली थी.
परवेज़ मेहदी सुना रहे हैं मुनीर नियाज़ी साहब की ग़ज़ल. इसे अर्सा पहले ग़ुलाम अली ने भी गाया था.
आज़ादी के बाद की पाकिस्तानी उर्दू शायरी में मुनीर नियाज़ी (१९२८-२००७) को फैज़ अहमद फैज़ और नून मीम राशिद के बाद का सबसे बड़ा शायर माना जाता है. यह शायर ताज़िन्दगी अपनी तनहाई से ऑबसेस्ड रहा और एक जगह कहता है:
इतनी आसाँ ज़िंदगी को इतना मुश्किल कर लिया
जो उठा सकते न थे वह ग़म भी शामिल कर लिया
फ़िलहाल ग़ज़ल सुनिये.
बेचैन बहुत फिरना, घबराए हुए रहना
एक आग सी जज़्बों की दहकाए हुए रहना
छलकाए हुए रखना ख़ुशबू-लब-ए-लाली की
इक बाग़ सा साथ अपने महकाए हुए रहना
इस हुस्न का शेवा है, जब इश्क नज़र आए
परदे में चले जाना, शर्माए हुए रहना
इक शाम सी कर रखना काजल के करिश्मे से
इक चांद सा आंखों में चमकाए हुए रहना
आदत ही बना ली है, तुमने तो मुनीर अपनी
जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना
डाउनलोड यहां से करें:
http://www.divshare.com/download/6933524-e40
Posted by Ashok Pande at 1:48 PM 10 comments
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Wednesday, January 7, 2009
संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आए मुझे
मुख़्तसर सी ये ग़ज़ल क़तील शिफ़ाई ने कही थी और उस्ताद मेहंदी हसन साहब ने इसे अपनी लाजवाब गुलूकारी से नवाज़ा.कुछ बंदिशें ऐसी हो जाती हैं कि उन पर वाचालता शोभा नहीं देती..लिहाज़ा मुलाहिज़ा फ़रमाएँ ये ग़ज़ल....
Posted by sanjay patel at 10:45 PM 3 comments
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Thursday, December 11, 2008
ए मेरी पलकों के तारो, सन सन करती पवन चले तो हम लेंगे दिल थाम
सूरज उभरा चन्दा डूबा, लौट आई फिर शाम,
शाम हुई फिर याद आया, इक भूला बिसरा नाम
कुछ भी लिख पाने की ताब नहीं फ़िलहाल. ज़रा देखिये उस्ताद मेहदी हसन ख़ान साहब क्या गा रहे हैं:
Posted by Ashok Pande at 5:46 PM 6 comments
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Friday, December 5, 2008
मेहंदी हसन - ना किसी की आँख का नूर हूँ
इन दिनों मन कई कारणों से बुझा बुझा सा रहा है सो कई बार अपने पीसी के सामने आकर बैठा भी लेकिन कुछ लिखने को जी नहीं चाहा;इसी बीच मुंबई के घटनाक्रम से दिल और घबरा सा गया है.हालाँकि सिर्फ़ और सिर्फ़ संगीत ही एक आसरा बचा रहा जिसने दिल को तसल्ली बख्शी है . एक ग़ज़ल मेहंदी हसन साहब की सुन रहा हूँ सो मन किया चलो इसी बहाने आपसे दुआ-सलाम हो जाए. बहादुरशाह ज़फ़र की ये रचना कितने जुदा जुदा रंगों में गाई गई है और हर दफ़ा मन को सुक़ून देती है. ज़फ़र का अंदाज़े बयाँ इतने बरसों बाद भी प्रासंगिक लगता है और यही किसी शायर की बड़ी क़ामयाबी है. चलिये साहब ज़्यादा कुछ लिखने की हिम्मत तो नहीं बन रही ..ग़ज़ल सुनें; एक नई लयकारी में इसे शहंशाह ए ग़ज़ल मेहंदी हसन साहब ने अपनी लर्ज़िश भरी आवाज़ में सजाया है.
Posted by sanjay patel at 9:28 AM 4 comments
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Sunday, November 9, 2008
अपना साया भी हमसे जुदा हो गया
उस्ताद मेहंदी हसन साहब की आवाज़ में ये नग़मा रेडियो के सुनहरी दौर की याद ताज़ा कर देता है. ये भी याद दिलाता है कि धुनें किस क़दर आसान हुआ करती थी; आर्केस्ट्रा के साज़ कितने सुरीले होते थे. इलेक्ट्रॉनिक बाजों का नामोनिशान नहीं था. सारंगी,वॉयलिन,बाँसुरी,सितार और तबले में पूरा समाँ बंध जाता था.हर टेक-रीटेक को वैसा ही दोहराना होता था जैसा म्युज़िक डायरेक्टर एक बार कम्पोज़ कर देता था.सुगम संगीत विधा की पहली ज़रूरत यानी शब्द की सफ़ाई को सबसे ज़्यादा तवज्जो दी जाती थी. लफ़्ज़ को बरतना उस्ताद जी का ख़ास हुनर रहा है. जब शब्द के मानी दिल में उतरने लगे तो उस्ताद अपने अनमोल स्वर से भावों को ऐसा उकेर देते हैं कि शायर की बात सुनने वाले के कलेजे में उतर आती है.मुख़्तसर सी ये रचना इस बात की तसदीक कर रही है.
Posted by sanjay patel at 12:35 PM 7 comments
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