Monday, June 22, 2009

गुज़ारिश : एक नई आवाज़ में रंजिश ही सही !


टाइम्स म्युज़िक हमेशा श्रोताओं के लिए कुछ नयापन लेता आया है। हाल ही में उसने जाने-माने युवा ग़ज़ल गायक मो. वक़ील की आवाज़ में गुज़ारिश नाम से एक बड़ा प्यारा एलबम जारी किया है। नई आवाज़ों को सुनने में हम संगीतप्रेमी थोड़े आलसी ही रहे हैं तो इस आदत को भाँपते हुए टाइम्स म्युज़िक ने एक बड़ी सुरीली पहल की है। इसके तहत गुज़ारिश एलबम में मो. वक़ील ने उन ग़ज़लों को गाया है जिनको हम पिछले 40-45 बरसों में निरंतर सुनते आए हैं। कभी रेडियो पर, कभी लाइव या कभी अपने प्रायवेट म्युज़िक कलेक्शन के ज़रिये। गुज़ारिश में शुमार आवाज़े भी उन महबूब गुलूकारों की हैं जो हम सबके दिल के बहुत क़रीब रहे हैं यानी बेग़म अख़्तर, मेहॅंदी हसन, फ़रीदा ख़ानम, लता मंगेशकर, ग़ुलाम अली, जगजीत सिंह और अहमद हुसैन-मो. हुसैन।

मो. वक़ील एक ऐसी उभरती हुई आवाज़ हैं जिनकी कहन में पुराने और नये अंदाज़ का कलेवर दमकता दिखाई देता है। इसकी दो वजह है; एक तो उनकी पैदाइश सन् 1976 की है और दूसरा उनकी तालीम उस्ताद अहमद हुसैन और मो. हुसैन के सान्निध्य में हुई है जो ग़ज़ल गायकी के ऐसे नुमाइंदे हैं जिन्होंने पारंपरिक गायन का दामन कभी नहीं छोड़ा है। यही वजह है कि मो. वक़ील की आवाज़ में एक रूहानी फ़िरत है। इस एलबम में वे अज़ीम फ़नकारों को दोहराते ज़रूर हैं लेकिन उन्होंने अपना मौलिक अंदाज़ भी बरक़रार रखा है। वक़ील भाई की आवाज़ में एक सुरीला घुमाव है जो उन्हें नई आवाज़ों की भीड़ में एक अलग पहचान देता है.हाँ ये भी बता दूँ कि किसी बात को अपनी तरह से कहने की उपज भी मो.वक़ील में भी बड़ी लाजवाब रही है.

टी.वी.एस. सारेगामा फ़ायनल (1997) और टी.वी.एस. सारेगामा मेगा फ़ायनल (1998) के विजेता के रूप में मो. वक़ील संगीत परिदृश्य पर उभरकर आए और उसके बाद वे लगातार अपनी मंज़िल की ओर अग्रसर हैं। सन् 2006 उनके लिए बड़ा मक़बूल रहा जब उन्हें वीर-ज़ारा में स्व. मदन मोहन की कम्पोज़िशन को गाने का अवसर मिला।

गुज़ारिश का कायाकल्प जानी-मानी कंपोज़र मंजू नारायण ने किया है। उन्होंने मूल कंपोज़ीशन्स की रूह को क़ायम रखा है और मो. वक़ील की आवाज़ में उभरकर आने वाले तत्वों को और बेहतर बनाने की कोशिश की है। उम्मीद है कि गुज़ारिश आपको सुकून देगी।


मो.वक़ील के इस नए एलबम में पहली रचना उस्ताद मेहंदी हसन साहब के प्रति एक आदरांजलि है.ग़ज़ल आप-हम की जानी पहचानी और गुनगुनाई हुई...रंजिश ही रही दिल ही दुखाने के लिये आ...मुलाहिज़ा फ़रमाएँ.

15 comments:

Arvind Mishra said...

वाह मिस्टर इंडियन मेहंदी हसन ! आपको भी शुक्रिया !

"अर्श" said...

wakil sahib ke gaane ka jo style hai wo unke guru ji se bakhubi mil rahaa hai ... jis tarah se naazukataa aur kabhi kabhi mukammal gale ki harkaten kamaal ki baat hai......bahot bahot badhaayee is naye gayak ko sunwaane ke liye ...


arsh

दिलीप कवठेकर said...

मो. वक़ील एक ऐसी उभरती हुई आवाज़ हैं जिनकी कहन में पुराने और नये अंदाज़ का कलेवर दमकता दिखाई देता है।

आपका कहना सही है. अपने मामूजान गुरुओं से जो हुनर पाया है, उसे और आगे बढाया है.

रंजिश ही सही - हमारे ज़ेहन में ये ग़ज़ल इतनी बस गयी है, कि उसे गा पाना किसी भी नये कलाकार के लिये चुनौती ही है. मगर इस युवा कलाकार नें वह काम बखूबी कर दिखाया है.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अच्छी लगी आवाज़ और प्रयास भी उम्दा रहा फिर भी,:)
ओरिजिनल तो वही
जहन मेँ रहेगी
- लावण्या

Udan Tashtari said...

बहुत आभार इस परिचय के लिए. इसके पहले ज्ञात न था.

Manish Kumar said...

इन्हें पहले सा रे गा मा पर सुना था। इस सदाबहार ग़ज़ल को वकील साहब की आवाज़ में सुनवाने का शुक्रिया !

manu said...

bahut hi khoobsoorti se gaayaa hai,,,
jaan hai aawaaz mein,,,gahraayeee bhi,

Nanak said...

M. vakeel ne pure ranjo-gam aur originality ke saath gazal ko pesh kiya hai, kisi ko pasand nahi aayi hai to use ye samajh lena chahiye ki aaj mehndi hasanji bhi oos tarah nahi ga sakte jaise hamare jehan me basi hui hai. Phir sochiye aaj shor ke beech gazal apnane wale hain kahan?

Ashok Pande said...

बहुत उम्दा प्रस्तुति संजय भाई!

Ashok Pande said...

बहुत उम्दा प्रस्तुति संजय भाई!

संजय पटेल... said...

वक़ील भाई कम्प्यूटर से आज दूर थे सो आप सब के प्रतिसाद को फ़ोन पर पढ़कर सुनाया. बहुत ख़ुश हुए. कहने लगे दाद मिलती है तो लगता है उस्तादों का सिखाया कुछ काम आया और परवरदिगार के दरवाज़े पर भेजी हुईं अर्ज़ियाँ क़ुबूल हो गईं.शुक्रिया कहा है उन्होंने आप सबका.स्वीक़ारें इस डाकिये के ज़रिये.

Raja Khan said...

HALKE LAFZO KO SUKHAN SE SANWAAR DETA HAI.
WOH GEHRE PAANI ME GHAZAL KO UTAAR DETA HAI

MOHD. VAKIL EK AISI DILKUSH KHUSHNUMA AAWAZ KI WOH GEHRAAI HAI JISKI TEH PATA KAR PAANA BAHOT MUSHKIL HAI I LOVE RASME ULFAT KYA GAAYA HAI BHAI WAH

Raja Khan said...

HALKE LAFZO SE SUKHAN KO SANWAAR SETA HAI
WOH GEHRE PAANI ME GHAZAL KO UTAR DETA HAI

श्याम सखा 'श्याम' said...

kisi parshidh kalaakar ki rachna gana cunauti bhra hota hai,vaisee to nahin lagi acchee rahi,badhaee blog jagat bheed men me ek bahut acchaablog hai aapakaa isliye bhi badhaayee

बाबुषा said...

प्लेयर ही नहीं चल रहा तो क्या मुलाहिजा फरमाएं ? :-(