Tuesday, March 29, 2011

कुछ न दवा ने काम किया

उर्दू शायरों की सूची में व्यक्तिगत रूप से मीर तक़ी मीर मेरे लिए सबसे ऊपर आए हैं. इस ख़ुदा-ए-सुख़न का ये जाना-पहचाना कलाम इस सोए हुए ब्लॉग को जगाने का काम करे, इस दुआ और इतने लम्बे समय तक यहां किसी नई पोस्ट न लगा पाने के लिए माफ़ी के साथ मलिका-ए-ग़ज़ल बेग़म अख़्तर की आवाज़ में




उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

अहद-ए-जवानी रो रो काटा पीरी में लीं आँखें मूँद
यानी रात बहुत थे जागे सुबह हुई आराम किया

याँ के सुफ़ेद-ओ-स्याह में हमको दख़्ल जो है सो इतना है
रात को रो-रो सुबहो किया और सुबहो को ज्यों त्यों शाम किया

'मीर' के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उनने तो
कश्क़ा खेंचा दैर में बैठा कब का तर्क़ इस्लाम किया

(अहद-ए-जवानी- युवावस्था, पीरी- बुढ़ापा, कश्क़ा- तिलक, तर्क़ इस्लाम किया- इस्लाम को छोड़ दिया)

3 comments:

मीनाक्षी said...

वापिसी खूबसूरत हुई..बेग़म साहिबा की आवाज़ जैसे गुड़ की डली ढली सी हो जो देर तक मिठास बनाए रखती है.

pratibha said...

behtreen!

daanish said...

देखा, इस बीमारी ए दिल ने ,
आखिर काम तमाम किया ........

वाह !
बहुत खूबसूरत पेशकश ..
मुबारकबाद .