Thursday, December 11, 2008

ए मेरी पलकों के तारो, सन सन करती पवन चले तो हम लेंगे दिल थाम

सूरज उभरा चन्दा डूबा, लौट आई फिर शाम,
शाम हुई फिर याद आया, इक भूला बिसरा नाम

कुछ भी लिख पाने की ताब नहीं फ़िलहाल. ज़रा देखिये उस्ताद मेहदी हसन ख़ान साहब क्या गा रहे हैं:

6 comments:

Udan Tashtari said...

मेंहदी हसन साहब को सुन कर तबीयत मस्त हो गई.आपका आभार.

mehek said...

bahut sundar

एस. बी. सिंह said...

मेहंदी हसन साहब.....लाजवाब हर बार की तरह

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुन्दर सुनवाने के लिये शुक्रिया

दिलीप कवठेकर said...

आप आये तो दिले नाशाद याद आया,

आपका स्वागत, और खां साहब के लिये आपकी तडप को सलाम

विनय said...

नववर्ष की शुभकामनाएँ